नयी दिल्ली, पांच नवंबर (भाषा) जबकि सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता की बात में दम हो सकता है।
उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को केंद्र सरकार से उस याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें न्यायाधीशों सहित संवैधानिक पदों पर रहे व्यक्तियों को इस्तीफे के बाद मिलने वाली सुविधाएं और अन्य लाभ बंद करने का अनुरोध किया गया है। न्यायालय ने उस वक्त केंद्र से जवाब तलब किया कि जब इसने (केंद्र ने) कहा कि याचिकाकर्ता की बात में दम हो सकता है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से याचिका पर जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा।
उन्होंने कहा, “मुझे निर्देश लेना होगा। मुझे लगता है कि याचिकाकर्ता की बात में दम हो सकता है।”
पीठ ने मामले को दिवाली के अवकाश के बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।
उच्चतम न्यायालय ने उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई, जिसमें यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया कि पद से हटाए जाने से बचने के लिए इस्तीफा देने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को सेवानिवृत्ति संबंधी सुविधाओं और अन्य लाभों से वंचित किया जाए।
इसने प्रतीक वीरा की ओर से दायर याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया था।
पीठ ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता का यह अनुरोध है कि वैसे संवैधानिक पदाधिकारी, जो पद से हटाने की किसी कार्यवाही या अविश्वास प्रस्ताव की कार्यवाही से बचने के लिए अपना इस्तीफा सौंपते हैं, उन्हें उस संवैधानिक पद से जुड़ी सुविधाओं और अन्य सभी आनुषंगिक सुविधाओं का हकदार नहीं होना चाहिए।”
इस जनहित याचिका (पीआईएल) का महत्व तब और बढ़ जाता है, जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा के इस्तीफे के संदर्भ में इसे देखा जाता है। पिछले साल 14 मार्च को दिल्ली में उनके सरकारी आवास पर नोटों की जली हुई गड्डियां मिलने के बाद, उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय वापस भेज दिया गया था।
उनके इस्तीफे के बाद, लोकसभा द्वारा वर्मा को हटाने के लिए शुरू की गई कार्यवाही “निष्प्रभावी” हो गई।
वीरा की याचिका में यह तर्क दिया गया है कि इस्तीफा देने के बाद भी, संवैधानिक पदों पर बैठे लोग अपने पद से जुड़ी सुविधाओं और लाभों को हासिल करते रहने के प्रति आश्वस्त रहते हैं।
भाषा प्रशांत सुरेश
सुरेश