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दवा संयंत्रों में जांच का काम लंबित, बैच जारी करने में देरी: अध्ययन

नयी दिल्ली, पांच नवंबर (भाषा) भारत में दवा विनिर्माण संयंत्रों में उत्पादन संबंधी घटनाओं के बड़ी संख्या में लंबित मामले और जांच पूरी करने में देरी के कारण दवाओं के बैच जारी करने में विलंब हो रहा है और प्रबंधन के वरिष्ठ पदाधिकारियों का काफी समय इन मामलों को सुलझाने में खर्च हो रहा है। एक परामर्श कंपनी की ओर से जारी श्वेतपत्र में यह बात कही गई है।

‘वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप’ का ‘दवा विनिर्माण में अनुपालन का दुष्चक्र’ शीर्षक वाला श्वेतपत्र भारत में स्थित कई मध्यम से बड़े आकार के यूएसएफडीए अनुमोदित दवा संयंत्रों के सर्वेक्षण पर आधारित है।

इसके मुताबिक, सर्वेक्षण में शामिल हर संयंत्र में कुछ ऐसी घटनाएं थीं, जिनका समाधान होना अभी बाकी था और इनमें से कुछ मामलों की जांच पूरी होने में छह महीने तक का समय लग सकता था।

श्वेतपत्र के अनुसार, लगभग 80 फीसदी प्रतिभागियों ने कहा कि जांच के कारण बैच जारी करने में सीधे तौर पर देरी होती है, जबकि वरिष्ठ पदाधिकारियों ने बताया कि वे अपना 27 प्रतिशत से अधिक समय लंबित मामलों को सुलझाने में बिताते हैं।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि बार-बार होने वाली विनिर्माण संबंधी घटनाओं को केवल व्यक्तिगत विफलताओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इनका विश्लेषण इस रूप में भी किया जाना चाहिए कि उत्पादन कार्य का दस्तावेजीकरण, पर्यवेक्षण और जांच किस तरह से की जाती है।

सर्वेक्षण के मुताबिक, विनिर्माण संबंधी जो घटनाएं सामने आती हैं, उनमें से 56 फीसदी के लिए मानवीय चूक जिम्मेदार होती है, जबकि ऑपरेटर ने प्रत्येक पाली में बैच उत्पादन रिकॉर्ड में औसतन 120 प्रविष्टियां दर्ज की थीं।

सर्वेक्षण में पर्यवेक्षण पर भारी बोझ की बात भी सामने आई। अस्सी प्रतिशत प्रतिभागियों ने बताया कि एक पाली के दौरान पर्यवेक्षक पांच या उससे अधिक प्रोडक्शन लाइन की देखरेख करते हैं, जिससे समस्याओं के सत्यापन करने और जल्द पहचान करने के लिए उपलब्ध समय सीमित हो सकता है।

‘वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप’ में साझेदार और श्वेतपत्र के सह-लेखक चंद्रचूड़ दत्ता ने कहा, “एक मजबूत गुणवत्ता तंत्र की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह कितने दस्तावेज तैयार करता है, बल्कि यह है कि क्या वह उत्पादन में रुकावट डाले बिना गलतियों को रोकने और कमियों को दूर करने में मदद करता है।”

उन्होंने कहा कि निर्माताओं को अलग-अलग घटनाओं से आगे बढ़कर यह समझने की जरूरत है कि वे बार-बार क्यों हो रही हैं।

दत्ता ने कहा कि अगर काम करने की प्रक्रियाएं ही ऐसी हैं, जिन्हें लागू करना या जिनकी जांच करना मुश्किल है, तो केवल और अधिक जांच परतें जोड़ने से समस्या जड़ से खत्म नहीं होगी।

सर्वेक्षण में जांच प्रक्रिया में देरी की बात भी उजागर हुई। लगभग 83 फीसदी प्रतिभागियों ने बताया कि जांच की मसौदा रिपोर्ट में कई बार संशोधन किए जाते हैं, जबकि 77 प्रतिशत ने सबूत जुटाने में हुई देरी को जानकारी की कमी से जोड़ा। इसके अलावा, 73 फीसदी प्रतिभागियों ने कहा कि कार्य संबंधी प्राथमिकताओं में अंतर के कारण जांच पूरी करने में देरी हुई या दोबारा काम करना पड़ा।

भाषा पारुल सुरेश

सुरेश