नयी दिल्ली, पांच नवंबर (भाषा) भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने उच्चतम न्यायालय में कहा है कि एकीकृत भुगतान प्रणाली (यूपीआई) की संशोधित व्यवस्था के तहत लगने वाले 'मर्चेंट डिस्काउंट रेट' (एमडीआर) शुल्क को व्यापारी ग्राहकों से नहीं वसूल सकते हैं।
एनपीसीआई ने तीन नवंबर को दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि यूपीआई ऐप उपलब्ध कराने वाली कंपनियां भी भुगतान के लिए उपयोगकर्ताओं से मंच शुल्क या कोई अन्य शुल्क नहीं ले सकती हैं।
यूपीआई प्रणाली का संचालन करने वाली सरकारी संस्था एनपीसीआई ने कहा, ‘‘एमडीआर का बोझ ग्राहकों पर डालने पर रोक का अनिवार्य निर्देश है और इसका उल्लंघन करने पर संबंधित बैंकों तथा भुगतान सेवा प्रदाताओं के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। इसमें उनकी यूपीआई सदस्यता समाप्त करना भी शामिल है।’’
शीर्ष अदालत ने 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा यूपीआई व्यक्ति-से-व्यापारी (पी2एम) लेनदेन पर एमडीआर लगाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर 28 सितंबर को केंद्र सरकार और एनपीसीआई समेत अन्य पक्षों से जवाब मांगा था। हालांकि, उसने इस व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था।
एनपीसीआई ने अपने हलफनामे में कहा कि संशोधित व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारी लेनदेन पर अधिकतम 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगेगा। खऱीदारों से दुकानदारों को होने वाले करीब 96 प्रतिशत लेनदेन इस शुल्क के दायरे से बाहर रहेंगे, क्योंकि वे 2,000 रुपये से कम होते हैं या शून्य एमडीआर व्यवस्था के तहत छोटे व्यापारियों से जुड़े हैं। इनके अलावा आम लोगों के बीच होने वाले व्यक्ति-से-व्यक्ति (पी2पी) लेनदेन भी शुल्क मुक्त रहेंगे।
एनपीसीआई ने एमडीआर लगने से ग्राहकों पर बोझ बढ़ने की आशंका को निराधार बताते हुए कहा कि शुल्क का दायरा सीमित होने से व्यापारियों के लिए सभी ग्राहकों के लिए कीमतें बढ़ाने की गुंजाइश कम है।
उसने कहा कि शून्य एमडीआर व्यवस्था के कारण यूपीआई प्रणाली के संचालन की लागत और उसे बनाए रखने के लिए उपलब्ध राजस्व के बीच अंतर पैदा हो गया था। भुगतान बुनियादी ढांचे, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने और ग्राहक सेवाओं में लगातार निवेश के लिए राजस्व की जरूरत है।
छोटे कारोबारियों को राहत देने के लिए एनपीसीआई ने सालाना 20 लाख रुपये तक का कारोबार करने वाले व्यापारियों के बीच यूपीआई को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष कोष बनाने का प्रस्ताव भी रखा है।
यह जनहित याचिका अधिवक्ता अंजन दत्ता ने दायर की है। इसमें भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए में संशोधन, वित्त मंत्रालय की अधिसूचना और एनपीसीआई की संशोधित एमडीआर व्यवस्था को चुनौती दी गई है।
सरकार ने 15 अक्टूबर से दो हजार रुपये से अधिक के व्यापारी यूपीआई भुगतान पर एमडीआर लागू किया था। हालांकि, बाद में इस फैसले को दिवाली तक के लिए टाल दिया गया था।
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