नयी दिल्ली, पांच नवंबर (भाषा) उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों के पीछे कथित ‘‘बड़ी साजिश’’ से जुड़े आतंकवाद रोधी कानून गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) मामले में जमानत देने से इनकार करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को कार्यकर्ताओं शरजील इमाम और उमर खालिद ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है।
कार्यकर्ताओं ने उच्चतम न्यायालय में दायर अपनी याचिका में दलील दी कि उन्हें जमानत दी जानी चाहिए, क्योंकि अभियोजन पक्ष गवाहों से जिरह करने में विफल रहा है और शीर्ष अदालत द्वारा लगाई गई एक साल की रोक की अवधि समाप्त होने वाली है।
इमाम की याचिका में दलील दी गई कि आरोपपत्र 25 सितंबर, 2020 को दाखिल किया गया था, जिसमें 18 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चल रहा है और अभियोजन पक्ष ने 900 से अधिक गवाहों का उल्लेख किया है।
खालिद ने अपनी याचिका में कहा कि अभियोजन पक्ष संरक्षित गवाहों से पूछताछ करने में विफल रहा है और उच्चतम न्यायालय द्वारा लगाई गई एक साल की रोक की अवधि भी समाप्त होने वाली है। ऐसे में लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा।
इमाम ने कहा कि विचाराधीन कैदी के रूप में छह साल और नौ महीने बिताने के बावजूद अभियोजन पक्ष अब तक एक भी गवाह से जिरह नहीं कर पाया है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों के पीछे कथित ‘‘बड़ी साजिश’’ से जुड़े यूएपीए मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से 30 सितंबर को इनकार कर दिया था।
पीठ ने कहा था कि वह उच्चतम न्यायालय के पांच जनवरी के उस आदेश में बदलाव नहीं कर सकती, जिसमें दोनों आरोपियों से कहा गया था कि वे संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने या आदेश पारित होने की तारीख से एक साल की अवधि पूरी होने, इनमें से जो भी पहले हो, उसके बाद जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं।
खालिद और इमाम ने निचली अदालत के चार जुलाई के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी, जिसमें गिरफ़्तारी के बाद तीसरी बार उनकी ज़मानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं।
निचली अदालत ने ज़मानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं और कहा था कि उसके पास उच्चतम न्यायालय के पांच जनवरी के आदेश का पालन करने के अलावा ‘‘कोई विकल्प नहीं’’ है, इसलिए वह न तो अर्जी पर विचार कर सकती है और न ही कोई राहत दे सकती है।
खालिद और इमाम के खिलाफ फरवरी 2020 में हुए दंगों के मुख्य साजिशकर्ताओं में शामिल होने के आरोप में यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया है। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़क उठी थी।
कार्यकर्ता खालिद सैफी और आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत अन्य लोगों पर भी बड़ी साजिश में संलिप्तता के आरोप में प्रकरण दर्ज किया गया था। दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने इस मामले की जांच की थी।
इमाम को इस मामले में 25 अगस्त 2020 को गिरफ्तार किया गया था, जबकि खालिद को 13 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था।
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने दो सितंबर, 2025 को खालिद और इमाम की ज़मानत याचिका खारिज कर दी थी।
उच्चतम न्यायालय ने पांच जनवरी को फ़ैसले को बरकरार रखा था, लेकिन सह-आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफ़ा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत दे दी थी।
भाषा
देवेंद्र अविनाश
अविनाश