नयी दिल्ली, पांच नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि हिरासत में होने वाली हिंसा मानवाधिकार उल्लंघन के सबसे गंभीर रूपों में से एक है और यह देश की एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है, जिसे न्यायिक रूप से भी स्वीकार किया गया है।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत की हमेशा से कोशिश रही है कि हिरासत में होने वाली हिंसा को खत्म किया जाए।
पीठ ने ये टिप्पणियां अपने उस फैसले में कीं, जिसमें कहा गया है कि गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा उस पल से शुरू हो जाती है, जब उसे हिरासत में लिया जाता है, न कि उस समय से, जब पुलिस औपचारिक रूप से गिरफ्तार करती है।
पीठ ने कहा, “हिरासत में होने वाली हिंसा हमारे देश की एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है और इसे न्यायिक रूप से भी स्वीकार किया गया है। यह अदालत पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे को लेकर लगातार चिंतित है।”
उसने कहा, ‘‘इसलिए यह स्पष्ट है कि इस अदालत का हमेशा से यही प्रयास रहा है कि पूछताछ के दौरान हिरासत में कोई हिंसा न हो, क्योंकि यह मानवाधिकारों के उल्लंघन के सबसे बुरे रूपों में से एक है।’’
शीर्ष अदालत ने भागलपुर जेल की 1979-80 की उन भयावह घटनाओं के सिलसिले में की गई टिप्पणियों का भी जिक्र किया, जिनमें कैदियों को अंधा कर दिया गया था। उसने कहा कि बिना रिमांड के हिरासत में रखने पर रोक लगाने वाले प्रावधान बहुत अच्छे हैं, क्योंकि ये मजिस्ट्रेट को पुलिस जांच पर नजर रखने में सक्षम बनाते हैं।
बिहार के भागलपुर में पुलिस ने अक्टूबर 1979 से जुलाई 1980 के बीच मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन करते हुए कई विचाराधीन कैदियों को अंधा कर दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने ‘डीके बसु’ मामले का भी जिक्र किया, जिसमें उसने गिरफ्तारी के समय अमल में लाए जाने वाले कुछ खास दिशा-निर्देश तय किए थे।
पीठ ने कहा, ‘‘इसी तरह, ‘डीके बसु’ मामले में अदालत ने देश में हिरासत के दौरान होने वाली हिंसा और पुलिस की शक्तियों के दुरुपयोग की व्यापकता को स्वीकार किया। अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों के बावजूद पुलिस हिरासत में यातना और मौत की बढ़ती घटनाएं चिंताजनक हैं।’’
उसने कहा, ‘‘अहम बात यह है कि इस अदालत ने दर्ज किया कि मानवाधिकारों का सबसे गंभीर उल्लंघन जांच के दौरान होता है। इसमें पुलिस जानकारी उगलवाने या अपराध कबूलवाने के लिए ‘थर्ड डिग्री’ तरीकों का सहारा लेती है। साथ ही वह गिरफ्तारी को छिपाने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाती है, जैसे कि गिरफ्तारी को रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं करना या किसी की आजादी छीनने को महज ‘लंबी पूछताछ’ बताना।”
भाषा पारुल सुरेश
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