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जंतर-मंतर प्रदर्शन : उच्चतम न्यायालय ने कहा, एचपीईसी को बहुत कम शिकायतें मिली हैं

नयी दिल्ली, पांच नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों के दौरान कथित हिंसा और पुलिस ज्यादती की पड़ताल कर रही उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (एचपीईसी) को अब तक हिंसा से प्रभावित लोगों की बहुत कम शिकायतें मिली हैं।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत द्वारा गठित समिति को पीड़ितों की ओर से याचिकाकर्ताओं द्वारा अदालत में पेश की गई सामग्री, जिसमें वीडियो क्लिप भी शामिल हैं, की जांच करने की अनुमति दी।

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली समिति ने अदालत को बताया कि शिकायतें ऑनलाइन और व्यक्तिगत रूप से दर्ज कराने के लिए पोर्टल शुरू करने तथा एक विशेष ईमेल पता उपलब्ध कराने के बावजूद उसे बहुत कम शिकायतें मिली हैं।

पीठ ने 31 अक्टूबर को समिति की ओर से दाखिल कार्रवाई रिपोर्ट पर गौर किया और कहा कि समिति ने शिकायतें आमंत्रित करने के लिए एक विशेष पोर्टल बनाया था और 17 अक्टूबर को देशभर के 149 समाचार पत्रों में नोटिस प्रकाशित कराए थे, जिनमें लोगों से ऑनलाइन, व्यक्तिगत रूप से या पंजीकृत डाक के माध्यम से शिकायतें देने को कहा गया था।

पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि बहुत कम प्रतिक्रियाएं मिलीं और इसलिए समिति ने 21 अक्टूबर को फिर से शिकायतें मांगी। इन प्रयासों के बावजूद पोर्टल पर बहुत कम शिकायतें मिली हैं और ईमेल पर एक भी शिकायत प्राप्त नहीं हुई है।’’

पीठ ने कहा, ‘‘हमने पक्षकारों के वकीलों से कहा है कि चूंकि शिकायतकर्ताओं/पीड़ितों के नाम उजागर करने की कोई आवश्यकता नहीं है, इसलिए उनके पास मौजूद सभी सामग्री एचपीईसी के दिए गए पते या पोर्टल पर भेजी जाए, ताकि समिति उस पर विचार कर सके। अदालत में दाखिल याचिकाएं और हलफनामे भी समिति को भेजे जाएं।’’

शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि कथित घटनाओं से संबंधित याचिकाएं, वीडियो और शिकायतें समिति को भेजी जाएं।

समिति में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा, दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश शालिंदर कौर, सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के पूर्व पुलिस महानिदेशक एल आर बिश्नोई भी शामिल हैं।

अदालत ने व्यक्तिगत कारणों से समिति से मुक्त किए जाने के बिश्नोई के अनुरोध को भी स्वीकार कर लिया।

पीठ ने समिति से कहा कि वह शिकायतों का अनिश्चितकाल तक इंतजार न करे और अब तक मिली सामग्री के आधार पर तथ्यों की जांच का काम आगे बढ़ाए।

पीठ ने कहा कि एचपीईसी ने 29 अक्टूबर को अपने कार्यालय में एक बैठक की थी और इसके बारे में मीडिया के माध्यम से प्रचार भी किया गया था। हालांकि, उस दिन केवल एक शिकायतकर्ता समिति के सामने पेश हुआ और उसने एक हलफनामा सौंपा। कुछ पुलिसकर्मी भी समिति के सामने पेश हुए थे।

कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने एचपीईसी की रिपोर्ट पर असहमति जताई। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने पोर्टल शुरू होने से पहले ही एक प्रतिवेदन सौंपा था और इसके शुरू होने के बाद एक और प्रतिवेदन दाखिल किया था।

शंकरनारायणन ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को बताया गया था कि उनके प्रतिवेदनों पर उचित समय पर विचार किया जाएगा।

वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से शीर्ष अदालत में पहले ही पेश की गई सामग्री को जांच के लिए समिति के पास भेजा जा सकता है, जिसमें पुलिस की कथित ज्यादती की घटनाएं दर्ज हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए प्रत्येक प्रभावित व्यक्ति को अलग-अलग समिति के पास जाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

हालांकि, केंद्र और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जनहित याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ताओं को संभवत: इन घटनाओं की व्यक्तिगत जानकारी नहीं हो, ऐसे में यह उचित होगा कि हिंसा से प्रभावित लोग खुद सामने आएं।

ग्रोवर ने आरोप लगाया कि कथित हिंसा और पुलिस ज्यादती की घटनाओं के संबंध में अब तक एक भी प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है।

प्रधान न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं से प्रभावित लोगों को समिति के समक्ष पेश होकर घटनाओं का अपना विवरण देने के लिए प्रोत्साहित करने का आग्रह किया।

शीर्ष अदालत ने अगस्त में कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एचपीईसी के गठन का आदेश दिया था। इन याचिकाओं में कॉजपा के नेतृत्व में हुए आंदोलन के दौरान छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की ज्यादती का आरोप लगाया गया था। वहीं, पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोप भी लगाए गए थे।

मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पें हुई थीं। संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाकर्मियों ने लाठीचार्ज किया था और आंसू गैस के गोले छोड़े थे।

छात्रों के नेतृत्व में शुरू हुआ यह प्रदर्शन कई शहरों तक फैल गया था। प्रदर्शनकारी तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े थे।

यह आंदोलन 20 जून को जंतर-मंतर से शुरू हुआ था और 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तथा सरकार द्वारा कॉजपा की अन्य मांगें स्वीकार किए जाने के बाद समाप्त हुआ था।

भाषा

शफीक अविनाश

अविनाश