नयी दिल्ली, पांच नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश उज्ज्वल भुइयां हाल के सार्वजनिक व्याख्यानों और शैक्षणिक दीक्षांत समारोहों में नागरिकों के मतदान के अधिकार, न्यायिक नियुक्तियों, उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम की कार्यप्रणाली, असहमति के अधिकार और संवैधानिक नैतिकता जैसे कई मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखते रहे हैं।
उच्चतम न्यायालय में 14 जुलाई 2023 को न्यायाधीश नियुक्त किये गए न्यायमूर्ति भुइयां ने बृहस्पतिवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इसमें कहा गया है कि गिरफ्तारी की 24 घंटे की समय-सीमा औपचारिक गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि हिरासत में लिये जाने के समय से शुरू होती है।
पिछले कुछ महीनों से, वे कानूनी और शैक्षणिक मंचों पर, खासकर देश भर में आयोजित होने वाले सप्ताहांत स्मृति व्याख्यानों में, विवादास्पद मुद्दों पर लगातार बोलते रहे हैं।
हैदराबाद स्थित ‘नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ’ में आयोजित 19वीं न्यायमूर्ति बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन कार्यक्रम में चार अक्टूबर को न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा था, “यदि किसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप अनगिनत भारतीय नागरिक अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक बन जाएं और उनके पास मतदान का अधिकार न रहे, तो ऐसी प्रक्रिया पूरी तरह से मनमानी है। किसी भी तरह की दलीलों से इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।”
मेघालय के यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के 12वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए 31 अक्टूबर को उन्होंने कहा, “जो समाज सवाल पूछने से डरता है, वह तानाशाही की चपेट में आ सकता है।”
उन्होंने शीर्ष अदालत के “पुरुष-प्रधान” होने पर भी टिप्पणी की थी और कहा था कि अदालत में महिलाओं की संख्या “देश में महिला वकीलों या महिलाओं के वास्तविक अनुपात को नहीं दर्शाती है”।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ने कॉलेजियम और न्यायपालिका में नियुक्तियों के विषय पर भी खुलकर बात की।
पुणे के आईएलएस लॉ कॉलेज में 24 जनवरी को न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा था, “जब कॉलेजियम खुद यह दर्ज करता है कि कोई तबादला केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया जा रहा है, तो यह एक गंभीर हस्तक्षेप को दर्शाता है।”
ये टिप्पणियां उस घटना के तीन महीने बाद आईं, जब उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन के तबादले की अपनी सिफारिश में बदलाव किया था। इसके तहत, उन्हें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेजने के बजाय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया। न्यायिक नियुक्तियों के संबंध में, ‘विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी’ की ‘न्यायिक पारदर्शिता सूचकांक रिपोर्ट’ के विमोचन के अवसर पर न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम द्वारा अपने फैसलों के लिए कारण न बताना “पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटने” जैसा है।
आपराधिक कानून और असहमति पर अपने विचार रखते हुए, न्यायमूर्ति भुइयां ने भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में भी बात की थी। इस दौरान उन्होंने एक ऐसी घटना पर अपनी राय व्यक्त की थी, जिसमें वाराणसी में गंगा नदी पर एक नाव पर चिकन बिरयानी खाने के आरोप में 14 मुस्लिम युवाओं को गिरफ्तार कर लिया गया था।
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। यह अपराध हो ही नहीं सकता... उन्हें इसी वजह से गिरफ्तार किया गया था और उन्हें तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा।”
फरवरी में एक सेमिनार के दौरान, न्यायमूर्ति भुइयां ने संवैधानिक गारंटियों और रोजमर्रा के भेदभाव के बीच के अंतर पर बात की थी और एक घटना साझा की।
उन्होंने बताया था कि उनकी बेटी की एक मुस्लिम सहेली को उसके धर्म की वजह से दिल्ली में रहने के लिए जगह नहीं मिली।
भाषा प्रशांत सुरेश
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