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औपचारिक गिरफ्तारी से नहीं, हिरासत में लेने से शुरू होगी 24 घंटे की गिरफ्तारी की समयसीमा : न्यायालय

नयी दिल्ली, पांच नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा उसे हिरासत में लिए जाने के क्षण से शुरू होती है, न कि पुलिस द्वारा औपचारिक रूप से गिरफ्तार किए जाने के समय से।

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के उद्देश्य से 'गिरफ्तारी' और 'हिरासत' के बीच कृत्रिम अंतर नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि ऐसी कोई भी व्याख्या संवैधानिक आदेश के विपरीत होगी, जिसके तहत पुलिस को औपचारिक गिरफ्तारी से पहले हिरासत में बिताई गई अवधि को 24 घंटे की समयसीमा से बाहर रखने की अनुमति मिले।

पीठ ने कहा, ‘‘यह विचार कि 24 घंटे की अवधि केवल औपचारिक गिरफ्तारी से शुरू होती है, संविधान के अनुच्छेद 22(2) और भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 56 के संवैधानिक आदेश के विपरीत है।'

उच्चतम न्यायालय का यह फैसला चार आरोपियों की अपील पर आया, जिन्होंने स्वापक औषधि एवं मन: प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज एक मामले में त्रिपुरा उच्च न्यायालय द्वारा उनकी जमानत याचिका खारिज किए जाने को चुनौती दी थी।

इस मामले में जांच एजेंसी ने आरोपियों को 29 सितंबर, 2025 को दोपहर करीब दो बजकर 30 मिनट पर हिरासत में लिया था। इस दौरान एजेंसी ने कथित तौर पर उनके पास से 11.03 किलोग्राम मेथामफेटामाइन की गोलियां बरामद की थीं।

न्यायालय ने कहा कि उनकी गिरफ्तारी आधिकारिक रूप से 30 सितंबर, 2025 को पूर्वाह्न 11:15 बजे दर्ज की गई और उन्हें उसी दिन शाम चार बजकर 45 मिनट पर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। यानी उन्हें पहली बार हिरासत में लिए जाने के 24 घंटे से अधिक समय बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।

पीठ ने कहा कि जांच एजेंसी ने तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया पूरी होने तथा औपचारिक रूप से गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के बीच के 18 घंटे के अंतराल का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।

पीठ ने कहा, '‘‘न्यायिक निगरानी के बिना 18 घंटे तक हिरासत में रखना एक लंबा समय है। इस दौरान अधिकारों के दुरुपयोग और मनमानी की आशंका स्पष्ट रूप से बनी रहती है।’’

फैसले में कहा गया है कि 24 घंटे की समयसीमा की गणना करते समय केवल गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में यथोचित रूप से लगने वाले समय को ही इसमें शामिल नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि औपचारिक गिरफ्तारी से पहले पूछताछ, जांच, तलाशी या जब्ती में लगा समय इस अवधि से बाहर नहीं रखा जा सकता।

संविधान का अनुच्छेद 22(2) कहता है कि गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए प्रत्येक व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए। इसमें गिरफ्तारी के स्थान से अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक समय शामिल नहीं होता।

शीर्ष न्यायालय ने ओडिशा उच्च न्यायालय के आर्यमन पटनायक मामले, मद्रास उच्च न्यायालय के कन्नन मामले और केरल उच्च न्यायालय के अरुण के. थॉमस मामले में दिए गए विचारों को खारिज कर दिया। इन मामलों में औपचारिक गिरफ्तारी से पहले हिरासत में बिताई गई अवधि को 24 घंटे की समयसीमा की गणना से बाहर रखने की अनुमति दी गई थी।

पीठ ने कहा कि समयसीमा की गणना करते समय गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाले आवश्यक समय के अलावा किसी अन्य अवधि को बाहर नहीं रखा जा सकता।

पीठ ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को अनुमेय 24 घंटे की अवधि से अधिक समय तक हिरासत में रखा जाता है और उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया जाता, तो उसे तत्काल रिहा किया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि संवैधानिक रूप से निर्धारित 24 घंटे की सीमा के भीतर भी किसी व्यक्ति को उचित अवधि से अधिक समय तक हिरासत में न रखा जाए।

फैसले में कहा गया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को हिरासत में लिए जाने की वास्तविक तारीख और समय दर्ज करना होगा और संवैधानिक समयसीमा का पालन हुआ है या नहीं, इसकी स्वतंत्र रूप से जांच करनी होगी।

पीठ ने कहा कि मजिस्ट्रेट को यह भी देखना होगा कि परिस्थितियों के अनुसार हिरासत की अवधि उचित है या नहीं। यदि हिरासत की अवधि जरूरत से ज्यादा है, तो वे रिमांड देने से इनकार कर सकते हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘आरोपी को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने के समय मजिस्ट्रेट का यह कर्तव्य है कि वह हिरासत में लिए गए व्यक्ति की वास्तविक हिरासत की तारीख और समय दर्ज करे। साथ ही, यह भी जांच करे कि हिरासत में लिए जाने के समय से 24 घंटे के भीतर उसे पेश करने की समयसीमा का पालन किया गया है या नहीं। यदि 24 घंटे की समयसीमा का उल्लंघन हुआ है, तो संबंधित व्यक्ति को तत्काल हिरासत से रिहा किया जाना चाहिए।’’

पीठ ने कहा कि मजिस्ट्रेट को यह भी आकलन करना चाहिए कि परिस्थितियों के लिहाज से हिरासत की अवधि उचित है या नहीं। यदि हिरासत की अवधि जरूरत से ज्यादा है, तो मजिस्ट्रेट आरोपी को रिमांड पर भेजने से इनकार कर सकता है।

न्यायालय ने जांच के दौरान हिरासत में होने वाली हिंसा का भी उल्लेख किया और कहा कि ''मानवाधिकारों का सबसे गंभीर उल्लंघन अक्सर तब होता है, जब पुलिस गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी करती है या हिरासत की अवधि को लंबी पूछताछ बताकर पेश करती है।''

भाषा

गोला माधव

माधव