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स्मृति, पहचान, स्वतंत्रता और मानवीय संवेदनाओं जैसे विषयों को रोजमर्रा के अनुभवों के माध्यम से प्रस्तुत करता ‘आमुख’

किशोर द्विवेदी

लखनऊ, पांच नवंबर (भाषा) भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी सत्यार्थ अनुरुद्ध पंकज की कविता संग्रह 'आमुख' स्मृति, पहचान, स्वतंत्रता और मानवीय संवेदनाओं जैसे विषयों को रोजमर्रा के अनुभवों के माध्यम से प्रस्तुत करता है, जो व्यक्तिगत अनुभवों से लेकर जीवन के व्यापक दार्शनिक और नैतिक सवालों तक की पड़ताल करती हैं।

राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस कविता संग्रह ‘आमुख’ में 70 से अधिक कविताएं हैं, जिसका विमोचन लखनऊ में हुआ ।

लखनऊ में पुस्तक विमोचन के दौरान प्रख्यात साहित्यिक आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि आज सार्वजनिक विमर्श में भाषा की संवेदनशीलता लगातार कम हो रही है और टेलीविजन बहसों और सोशल मीडिया पर अपमानजनक भाषा तथा दूसरों के दुख के प्रति असंवेदनशीलता बढ़ रही है।

उन्होंने साहित्य को इस प्रवृत्ति का प्रभावी जवाब बताते हुए कहा कि साहित्य व्यक्ति को दूसरों की पीड़ा समझने और उनके अनुभवों से जुड़ने की क्षमता देता है।

अग्रवाल के मुताबिक, 'आमुख' की विशेषता यह है कि इसमें साधारण घटनाओं एवं परिचित रिश्तों के जरिए गहरे मानवीय प्रश्न उठाए गए हैं।

इस संग्रह में पिता, मां, गांव, शहर, घर और परिवार जैसी छवियों के माध्यम से उम्र, विस्थापन, स्वतंत्रता, सामाजिक जिम्मेदारी और नैतिक विकल्पों को अभिव्यक्त किया गया है।

संग्रह की एक कविता में पिता की शहरों से जुड़ी स्मृतियां अपनत्व और विस्थापन का सवाल उठाती हैं, जबकि दूसरी में बच्चे के वृत्त बनाने के प्रयास के जरिए स्वतंत्रता और निर्धारित सीमाओं के बीच का अंतर सामने आता है।

वर्ष 2010 बैच के आईपीएस अधिकारी पंकज उत्तर प्रदेश में कार्यरत हैं। बिहार के सासाराम में जन्मे पंकज ने हिंदी में परास्नातक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एमफिल किया है।

उन्होंने बताया कि संग्रह की कुछ कविताएं करीब दो दशक पहले लिखी गई थीं। उनके अनुसार, 'आमुख' उनके साहित्यिक सफर की पहली पुस्तक है।

भाषा किशोर जफर मनीषा रंजन

रंजन