तिरुवनंतपुरम, चार नवंबर (भाषा) लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद के शीतकालीन सत्र से पहले बुधवार को कहा कि सहमति और असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, लेकिन संसद में सार्थक चर्चा होनी चाहिए।
बिरला ने यह भी कहा कि संसद में सभी बहस और चर्चाएं बिना किसी व्यवधान के होनी चाहिए।
उन्होंने यहां संसद और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों के सभापतियों के सम्मेलन से इतर संवाददाताओं से कहा, ‘‘सार्थक चर्चा होनी चाहिए। सहमति और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हैं। केवल सार्थक चर्चा से ही सभी मतभेदों का समाधान हो सकता है।’’
संसद का शीतकालीन सत्र इस महीने के अंत या अगले महीने की शुरुआत में आरंभ होने की संभावना है।
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का मुद्दा संसद में चर्चा के लिए उठने की संभावना के बारे में पूछे जाने पर बिरला ने कहा कि सदन में किन मुद्दों पर चर्चा होगी, इसका फैसला कार्य मंत्रणा समिति (बीएसी) करेगी।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए महाभियोग संबंधी कोई नोटिस मिलने के बारे में पूछे जाने पर लोकसभा अध्यक्ष ने इससे इनकार किया।
विपक्ष एसआईआर के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहा है और मुख्य निर्वाचन आयुक्त कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है। ऐसे में शीतकालीन सत्र के हंगामेदार रहने की संभावना है।
इससे पहले, दो दिवसीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए बिरला ने कहा कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि सरकार द्वारा आवंटित धन का उचित उपयोग हो और बजट में बढ़ा हुआ आवंटन अपेक्षित नतीजों में तब्दील हो।
उनका कहना था कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बुनियादी ढांचे, सामाजिक कल्याण और ग्रामीण विकास सहित विभिन्न क्षेत्रों में निवेश बढ़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक व्यय और बजट आवंटन का आकार भी बढ़ रहा है।
बिरला ने कहा, ‘‘किसी भी योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि विधायी समितियां लगातार उसकी निगरानी करें और यह सुनिश्चित करें कि किसी खास उद्देश्य के लिए आवंटित बजट का इस्तेमाल वास्तव में उसी उद्देश्य के लिए हो।’’
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता, परियोजनाओं को समय पर पूरा करने और सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक सही समय पर पहुंचाने जैसे सभी पहलुओं का उचित मूल्यांकन जरूरी है।
बिरला ने कहा, ‘‘लोकतंत्र में जब हम विचार-विमर्श के लिए एक साथ आते हैं तो केंद्र और राज्यों की समितियों के बीच अनुभवों, कार्यप्रणालियों और सर्वोत्तम तौर-तरीकों का आदान-प्रदान होता है।’’
उन्होंने कहा कि इस तरह का आदान-प्रदान समितियों के कामकाज और संस्थागत क्षमता को मजबूत करता है। साथ ही, इससे नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्टों की प्रभावी जांच करने और उनकी सिफारिशों पर समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने में भी मदद मिलती है।
बिरला ने कहा कि प्रशासनिक परिदृश्य में बदलाव के साथ शासन में प्रौद्योगिकी की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
उन्होंने कहा, ‘‘हमें यह पता लगाना चाहिए कि समितियां अपने कामकाज को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और परिणामोन्मुखी बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का किस तरह बेहतर इस्तेमाल कर सकती हैं।’’
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि सभी संबंधित पक्षों का एक साझा दृष्टिकोण और संकल्प होना चाहिए कि ‘‘जनता के धन का उपयोग व्यापक जनहित में किया जाए।’’
उन्होंने कहा कि दो दिवसीय विचार-विमर्श के दौरान यह साझा भावना सामने आई कि सार्वजनिक धन के प्रत्येक रुपये की योजना बनाई जाए, उसका आवंटन हो और उसका उपयोग पारदर्शी तथा जवाबदेह तरीके से किया जाए।
बिरला ने कहा, ‘‘हमें सामूहिक रूप से इस बात की समीक्षा करनी चाहिए कि हमारी समितियां कार्यपालिका की जवाबदेही किस तरह मजबूत कर सकती हैं।’’
उनके मुताबिक, इस लिहाज से यह सम्मेलन विशेष महत्व रखता है।
बिरला ने कहा, ‘‘हमारी प्रमुख चिंताओं में से एक लेखा-परीक्षा पूरी होने के बाद संसदीय जांच और अनुवर्ती कार्रवाई की व्यवस्था को बेहतर बनाने की जरूरत रही है।’’
उन्होंने कहा कि विभिन्न राज्यों की समितियों के सभापतियों और सदस्यों ने भी एक गंभीर चिंता सामने रखी है कि लेखा-परीक्षा रिपोर्ट अक्सर लंबे समय तक बिना उचित कार्रवाई के लंबित रहती हैं।
बिरला ने कहा, ‘‘इस संबंध में जवाबदेही तय की जानी चाहिए। कार्यक्रमों को लागू करने की जिम्मेदारी कार्यपालिका की है, जबकि उनके क्रियान्वयन की समीक्षा और निगरानी करना विधायिका का दायित्व है। यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी और संकल्प है।’’
सम्मेलन में सभी प्रतिनिधियों के सहयोग और भागीदारी से एक सामूहिक प्रस्ताव भी पारित किया गया।
बिरला ने कहा कि यह प्रस्ताव लोक लेखा समितियों के लिए वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने का मार्गदर्शक ढांचा बनेगा।
उनका कहना था, ‘‘हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक धन के प्रत्येक रुपये का प्रबंधन और उपयोग जनकल्याण के लिए पारदर्शी तथा जवाबदेह तरीके से हो।’’
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि लेखा-परीक्षा के बाद संसदीय जांच और समीक्षा की प्रक्रिया को और बेहतर बनाने की जरूरत है, ताकि प्रभावी निगरानी हो सके और लोक लेखा समितियों की अनुशंसाओं पर समयबद्ध तरीके से अमल सुनिश्चित किया जा सके।
भाषा हक माधव
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