Breaking News

'दिल्ली की हवा में 30 सिगरेट पीने जैसा जोखिम झेल रहे लोग', प्रदूषण पर SC ने कहा     |   UP पुलिस को मिले 4,543 नए दरोगा, CM योगी ने बांटे नियुक्ति पत्र     |   पटना में पुलिस-STF का बड़ा एक्शन, मुठभेड़ में 3 अपराधी ढेर     |   योगी सरकार का बड़ा फैसला, आपदा में मौत पर अब परिवार को मिलेंगे 8 लाख रुपये     |   हिमाचल प्रदेश में तड़के सुबह भूकंप के झटके, चंबा में दर्ज हुई 3.2 तीव्रता     |  

न्यायालय का संसद-विधानसभाओं के आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को बदलने की याचिका पर सुनवाई से इनकार

नयी दिल्ली, चार नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को संसद और राज्य विधानसभाओं के अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को अनिवार्य रूप से चक्रीय आधार पर बदलने का अनुरोध करने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि ऐसे फैसले विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और अदालतें इस संबंध में आदेश नहीं दे सकतीं।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) को बरकरार रखा गया था। यह प्रावधान उन क्षेत्रों में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान करने से संबंधित है, जहां एससी/एसटी आबादी का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक है।

याचिकाकर्ता जगदीश सिंह उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर जिले के 191-कादीपुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता हैं। उन्होंने इस निर्वाचन क्षेत्र को लगातार अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रखे जाने को चुनौती दी थी। उनका दावा था कि इस सीट के गठन के बाद से करीब सात दशक से यह सीट आरक्षित है।

उन्होंने दलील दी कि आरक्षण में आवर्तन की व्यवस्था नहीं होने से संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 का उल्लंघन होता है। इससे मतदाताओं के चुनावी विकल्प भी सीमित होते हैं, क्योंकि वे केवल अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों में से ही अपना प्रतिनिधि चुन सकते हैं।

याचिका में दावा किया गया कि मौजूदा व्यवस्था से व्यापक समुदाय के हितों को आगे बढ़ाने के बजाय कुछ सीमित राजनीतिक परिवारों को लाभ मिल रहा है।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 243डी और 243टी के तहत पंचायतों और नगरपालिकाओं में आरक्षण के आवर्तन की व्यवस्था के समान तंत्र बनाने की मांग की गई थी।

इसमें पीठ से एससी/एसटी के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में समय-समय पर बदलाव करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाताओं से जाति या धर्म के बजाय राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर चुनावी विकल्प चुनने की अपेक्षा की जाती है।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘राजनीतिक लोकतंत्र में अलग-अलग विचारधाराओं वाले कई राजनीतिक दल होते हैं। मतदाताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे धर्म के बजाय राजनीतिक दल को ध्यान में रखकर वोट दें। आप किसी खास राजनीतिक विचारधारा को पसंद या नापसंद कर सकते हैं। उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है, यह अप्रासंगिक हो जाता है। आप उस विचारधारा के लिए वोट देते हैं। इसलिए यह बात भी आपकी दलील को खारिज करती है।’’

भाषा संतोष नरेश

नरेश