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बच्चे को ‘ना’ कैसे कहें और अपने फैसले पर कैसे कायम रहें?

( फियोना बॉयलन, एडिथ कोवान यूनिवर्सिटी )

जोंडालुप (ऑस्ट्रेलिया), चार नवंबर (द कन्वरसेशन) छोटे बच्चों के माता-पिता के लिए उन्हें ‘ना’ कहना सबसे मुश्किल कामों में से एक हो सकता है।

मसलन, ''नहीं, हम यह चीज नहीं खरीदेंगे'' या ''नहीं, तुम मेरा फोन नहीं ले सकते।''

कई माता-पिता इस बात से परेशान रहते हैं कि उनकी किसी मांग को ठुकराने पर छोटे बच्चे रोने लगते हैं, बहस करते हैं या गुस्से में जिद करने लगते हैं।

लेकिन क्या हो अगर बच्चे का नाराज होना इस बात का संकेत न हो कि कुछ गलत हो गया है?

---- बच्चों के लिए ‘ना’ सुनना भी जरूरी ----

भावनाएं जीवन का हिस्सा हैं और बड़े होने की प्रक्रिया का भी। विकासात्मक मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान से जुड़े शोध बताते हैं कि बच्चों को ‘ना’ कहना उन्हें उचित सीमाओं और बंधनों से परिचित कराने में मदद करता है।

‘ना’ का अनुभव बच्चों के लिए अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना, निराशा से निपटना और मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता विकसित करने का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बच्चे शैशवकाल से ही अपनी भावनाओं को संभालना शुरू कर देते हैं। बचपन के शुरुआती वर्षों में विकसित होने वाले भावनात्मक नियंत्रण के कौशल का उनके जीवन पर लंबे समय तक असर पड़ता है। इससे उन्हें चुनौतियों का सामना करने, रिश्ते बनाने और स्कूल में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद मिलती है।

---- भावनात्मक नियंत्रण और सीमाओं का महत्व ----

भावनात्मक नियंत्रण का अर्थ मुश्किल भावनाओं से बचना नहीं, बल्कि उन्हें महसूस करना, समझना और धीरे-धीरे संभालना सीखना है। बच्चे निराशा, हताशा, उत्साह और इंतजार जैसे अनुभवों से गुजरकर ये कौशल विकसित करते हैं। इसमें माता-पिता और अन्य भरोसेमंद वयस्कों की भूमिका अहम होती है।

शोध बताते हैं कि बच्चों को उचित सीमाओं का अनुभव कराना उनके व्यवहार और भावनाओं पर नियंत्रण विकसित करने में मदद करता है। मसलन, ''नहीं, तुम बिस्कुट का पूरा डिब्बा नहीं खा सकते'' या ''नहीं, तुम गाड़ी पर नहीं चढ़ सकते।''

बच्चों को हर मुश्किल भावना से बचाने के बजाय माता-पिता को उन्हें निराशा और असफलता से निपटना सिखाना चाहिए। जरूरत से ज्यादा छूट देने वाली परवरिश में स्पष्ट सीमाओं का अभाव होता है। अध्ययनों के मुताबिक, इसका संबंध बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याओं और चिंता के अधिक स्तर से हो सकता है।

---- बच्चे को ‘ना’ कहने के सही तरीके ----

छोटे बच्चों को ‘ना’ कहते समय स्पष्ट और आत्मविश्वास से भरा जवाब दें। इसे मोलभाव का विषय न बनाएं। ''शायद बाद में'' कहने के बजाय स्पष्ट कहें, ''नहीं, आज हम चॉकलेट नहीं खरीदेंगे।''

साथ ही बच्चे की भावनाओं को समझें। उससे कहें, ''मैं समझ सकता हूं कि तुम नाराज हो, क्योंकि तुम चॉकलेट चाहते थे। लेकिन मेरा जवाब अब भी ना है।'' यदि माता-पिता बच्चे की लगातार जिद के आगे बार-बार झुकते हैं तो उसे लगता है कि ज्यादा मांगने पर जवाब बदल सकता है।

---- बच्चे को ‘ना’ स्वीकार करना कैसे सिखाएं? ----

1. किताबों और फिल्मों से भावनाएं समझाएं: बच्चों को किताबों और फिल्मों के पात्रों की भावनाओं के बारे में बताएं। मसलन, उनसे पूछें कि कोई पात्र क्यों रो रहा है या दुखी है। इससे उन्हें अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए सही शब्द सीखने में मदद मिलेगी।

2. खुद उदाहरण पेश करें: गुस्सा आने पर बच्चे को दिखाएं कि आप गहरी सांस लेकर खुद को शांत कैसे करते हैं। शोध बताते हैं कि बच्चे बड़ों की बातें सुनने के साथ-साथ उनके व्यवहार को देखकर भी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीखते हैं।

3. मुश्किल समय में बच्चे का साथ दें: यदि बच्चा जिद करने लगे या गुस्सा हो जाए तो शांत रहें और तुरंत प्रतिक्रिया न दें। उससे कहें, ''मैं समझ सकता हूं कि खेल के मैदान से जाने पर तुम निराश हो।'' उसे सांत्वना दें, लेकिन अपने फैसले पर कायम रहें। इससे बच्चा सीखता है कि उसकी भावनाओं को स्वीकार किया जाता है और वह उनसे निपट सकता है।

4. खेल के जरिए अभ्यास कराएं: टेडी बियर, गुड़िया या अन्य खिलौनों की मदद से ऐसी परिस्थितियों का अभिनय करें, जिनमें बच्चे को ‘ना’ सुनना पड़ सकता है। मसलन, पार्क से घर लौटने का खेल खेलें। इससे बच्चे निराशा और गुस्से जैसी भावनाओं को समझने तथा उनसे निपटने के तरीके सीख सकते हैं। शोध के अनुसार, कल्पनाशील खेल बच्चों में आवेगों पर नियंत्रण और भावनात्मक प्रबंधन की क्षमता विकसित करने में मदद करते हैं।

5. अच्छे व्यवहार की सराहना करें: यदि बच्चा खेल के मैदान से लौटते समय रोने या जिद करने के बजाय खुद को संभाल ले तो उसकी प्रशंसा करें। उदाहरण के लिए, कहें, ''बहुत अच्छा, आज तुम झूले से कितनी जल्दी उतर गए।'' सकारात्मक प्रोत्साहन से बच्चों में अच्छे व्यवहार को दोहराने की संभावना बढ़ती है।

6. बच्चों से उचित अपेक्षाएं रखें: यह उम्मीद करना सही नहीं है कि बच्चे हर बार ‘ना’ सुनकर बिना परेशान हुए उसे स्वीकार कर लेंगे। उनका मस्तिष्क अभी विकसित हो रहा होता है और भावनाओं तथा आवेगों पर नियंत्रण की क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती।

मसलन, तीन साल के बच्चे को अचानक उसका पसंदीदा कार्यक्रम बंद करने के लिए कहना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में उसे पांच मिनट पहले बता दें कि अब कार्यक्रम खत्म होने वाला है।

---- बच्चों को निराशा से उबरना सिखाएं ----

जब माता-पिता उचित सीमाएं तय करते हुए बच्चों की भावनाओं को भी समझते हैं तो वे उन्हें एक महत्वपूर्ण सीख देते हैं। समय के साथ बच्चे समझने लगते हैं कि निराश होना या परेशान महसूस करना सामान्य है और इन भावनाओं से उबरकर आगे बढ़ा जा सकता है।

(द कन्वरसेशन) मनीषा अविनाश

अविनाश