पर्थ, चार नवंबर (द कन्वरसेशन) एक दशक से भी कम समय पहले पृथ्वी की कक्षा में करीब 2,000 सक्रिय उपग्रह थे। आज इनकी संख्या बढ़कर 15,000 से अधिक हो गई है। आने वाले समय में लाखों और उपग्रह भेजने की योजना है।
इन उपग्रहों से पैदा होने वाली 'अंतरिक्ष अपशिष्ट' की समस्या पर काफी चर्चा हुई है।
लेकिन एक दूसरी समस्या पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। इन उपग्रहों से निकलने वाला रेडियो शोर उन दूरबीनों को प्रभावित कर रहा है, जो ब्रह्मांड को समझने में हमारी मदद करती हैं। इससे जीपीएस को सही ढंग से काम करने में मदद देने वाले माप भी गलत हो रहे हैं।
राहत की बात यह है कि इस समस्या को ठीक करने का एक तरीका है, बशर्ते हम अभी कदम उठाएं।
प्रारंभिक ब्रह्मांड को समझना
रेडियो दूरबीनें उन संकेतों को पकड़ सकती हैं, जो बिग बैंग के कुछ समय बाद पैदा हुए थे। इनकी मदद से खगोलविद प्रारंभिक ब्रह्मांड और पिछले 13.8 अरब वर्ष में इसके विकास को समझ पाते हैं।
रेडियो दूरबीनें बहुत दूर स्थित आकाशगंगाओं की सटीक स्थिति का पता लगाने में भी मदद करती हैं। इन आकाशगंगाओं को आधार बनाकर पृथ्वी पर जीपीएस जैसी तकनीकों को अधिक सटीक बनाया जाता है। जीपीएस का इस्तेमाल किसी स्थान का पता लगाने, रास्ता खोजने और समय निर्धारित करने के लिए होता है।
ऑस्ट्रेलिया रेडियो खगोल विज्ञान के क्षेत्र के अग्रणी देशों में शामिल रहा है। 1940 के दशक में सिडनी के पूर्वी उपनगर डोवर हाइट्स में शोधकर्ताओं ने हमारे सौरमंडल के बाहर रेडियो तरंगें पैदा करने वाले अलग-अलग स्रोतों की पहचान की थी।
साल 1946 में रूबी पायने-स्कॉट दुनिया की पहली महिला रेडियो खगोलविद बनीं। एमडब्ल्यूए और एएसकेएपी जैसी विश्वस्तरीय दूरबीनें ऑस्ट्रेलिया के रेडियो खगोल विज्ञान कार्यक्रम की प्रमुख उपलब्धियां हैं।
कम आवृत्ति वाली दुनिया की सबसे बड़ी रेडियो दूरबीन एसकेए-लो का निर्माण भी पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के एक दूरदराज के इलाके में किया जा रहा है।
ब्रह्मांड से आने वाली रेडियो तरंगें बेहद कमजोर होती हैं।
इन संकेतों को पकड़ने के लिए रेडियो दूरबीनों को इंसानों द्वारा पैदा किए जाने वाले शक्तिशाली रेडियो संकेतों से बचाना पड़ता है। ये संकेत मोबाइल फोन और रेडियो संचार उपकरणों से निकलते हैं। यही वजह है कि रेडियो दूरबीनें ऐसे शांत स्थानों पर बनाई जाती हैं, जहां रेडियो तरंगों का शोर कम हो।
उपग्रह रेडियो दूरबीनों के लिए खतरा पैदा करते हैं, क्योंकि उनमें लगे जटिल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से अनचाही रेडियो ऊर्जा निकल सकती है। यह ऊर्जा उपग्रहों और जमीन पर बने केंद्रों के बीच डेटा भेजने के लिए इस्तेमाल होने वाले रेडियो संकेतों से अलग होती है।
उपग्रह संचालक अपने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को इस तरह सुरक्षित बनाते हैं कि उनसे निकलने वाली अनचाही रेडियो ऊर्जा प्रक्षेपण रॉकेटों में हस्तक्षेप न करे। लेकिन उपग्रहों के अंतरिक्ष में पहुंचने और काम शुरू करने के बाद भी ऐसी ऊर्जा का रिसाव होता है।
अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) का रेडियो कम्युनिकेशन सेक्टर वह संस्था है, जो खगोलविदों और व्यावसायिक संस्थाओं के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी के इस्तेमाल के नियम तय करती है।
उपग्रहों पर लगे रेडियो संकेत भेजने वाले उपकरणों के लिए नियम इस आधार पर बनाए जाते हैं कि उपग्रह से किस तरह के संकेत भेजे जाने की योजना है। इनमें अनचाही रेडियो ऊर्जा के लीकेज को शामिल नहीं किया जाता।
इन नियमों को लागू कराने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय नियामकों की होती है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलियाई संचार एवं मीडिया प्राधिकरण। जमीन पर लगे रेडियो उपकरणों के मामले में यह व्यवस्था काम करती है, क्योंकि दूरबीनों की सुरक्षा करने वाली नियामक संस्था उन्हीं उपकरणों पर नियंत्रण रखती है। लेकिन उपग्रहों के मामले में यह व्यवस्था काम नहीं करती।
किसी भी दूरबीन को नियंत्रित करने वाली संस्था का किसी दूसरे देश के उपग्रह पर अधिकार नहीं होता।
पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में एक रेडियो दूरबीन की मदद से मेरी टीम ने स्टारलिंक उपग्रहों से निकलने वाली कम आवृत्ति की रेडियो ऊर्जा को मापा। यह आवृत्ति 70 से 300 मेगाहर्ट्ज (एमएचजेड) के बीच थी।
हम विशेष रूप से यह पता लगाना चाहते थे कि क्या इन उपग्रहों से निकलने वाले रेडियो संकेत अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ की ओर से तय सीमा से अधिक हैं।
हमने पाया कि 50 से 70 प्रतिशत समय तक ये संकेत तय सीमा से अधिक थे। अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों के मुताबिक, दूरबीन के कुल मापों में से अधिकतम दो प्रतिशत में ही इस सीमा का उल्लंघन स्वीकार्य है। ऐसे में हमारी टीम का यह निष्कर्ष स्वीकार्य सीमा से कहीं अधिक है।
यह नतीजा चिंता बढ़ाने वाला है, खासकर इसलिए कि ये माप 2024 में किए गए थे और अब दो साल पहले की तुलना में अंतरिक्ष में कहीं अधिक उपग्रह मौजूद हैं।
इस समस्या को ठीक करने का मौका अभी मौजूद है, इससे पहले कि उपग्रहों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ जाए। अगर हमने यह मौका गंवा दिया तो रेडियो खगोल विज्ञान का मौजूदा स्वरूप खत्म हो सकता है। इससे जीपीएस जैसी बेहद महत्वपूर्ण तकनीकों पर भी खतरा पैदा हो सकता है।
इस दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम ऐसी व्यवस्था लागू करना है, जिसके तहत उपग्रहों से होने वाले रेडियो हस्तक्षेप की नियमित निगरानी की जा सके।
इससे अधिक मजबूत वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने में मदद मिलेगी। इन साक्ष्यों के आधार पर नीतिगत फैसले लेने, मानक तय करने और अंततः नियमों को लागू कराने में मदद मिल सकेगी।
इस मामले में ऑस्ट्रेलिया के पास नेतृत्व करने का अनूठा अवसर है। यहां रेडियो दूरबीनें हैं, इस क्षेत्र में पुराना अनुभव है और आसमान भी सबसे शांत है।
(द कन्वरसेशन) जोहेब अविनाश
अविनाश