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मेघालय की गुफा के ‘स्टैलेग्माइट’ से 6,000 साल पुराना ‘मौसम का इतिहास’ पता चला: अध्ययन

शिलांग, चार नवंबर (भाषा) जरा सोचिए, क्या कोई पत्थर समय के पन्नों को पलट सकता है? मेघालय की अंधेरी और रहस्यमयी मावसमाई गुफा के अंदर मौजूद एक छोटे से ‘स्टैलेग्माइट’ ने ठीक ऐसा ही कर दिखाया है जिसने पिछले 6,000 वर्षों के दौरान पूर्वोत्तर भारत में मानसून के उतार-चढ़ाव की पूरी कहानी अपने भीतर संजोकर रखी है।

यह दिलचस्प जानकारी खड़गपुर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की याचना वर्मा और अनिल के. गुप्ता तथा कोलकाता स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) के प्रशांत सान्याल के नेतृत्व में किए गए एक शोध में सामने आई है। इस अध्ययन में उनके साथ प्रियंतन गुप्ता, सोम दत्त, पंकज कुमार और अभिजीत मुखर्जी भी सह-लेखक के रूप में शामिल थे।

गुफा की छत से टपकने वाली पानी की बूंदों में घुले खनिज जमीन पर जमा होते रहते हैं। हजारों वर्षों में इनके जमाव से नुकीले या स्तंभ जैसी आकृतियां बन जाती हैं जिन्हें ‘स्टैलेग्माइट’ कहते हैं।

अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘पैलियोग्राफी, पैलियोक्लाइमेटोलॉजी, पैलियोइकोलॉजिकल’ में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, आज से लगभग 11,807 से 7,700 साल पहले शुरुआती ‘होलोसीन’ काल के दौरान यहां का मानसून आज की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली था, लेकिन इसके बाद 7,700 से 5,622 साल पहले के दौर में मानसूनी गतिविधियों में धीरे-धीरे कमी आनी शुरू हुई।

शोधकर्ताओं ने प्राचीन मानसून की स्थितियों को समझने के लिए इस ‘स्टैलेग्माइट’ की ‘पेट्रोग्राफिक’, खनिज संबंधी विशेषताओं और स्थिर ऑक्सीजन आइसोटोप संरचना का बारीकी से विश्लेषण किया।

दिलचस्प बात यह है कि इस गुफा के इस 11 सेंटीमीटर लंबे टुकड़े ने सिर्फ भारत के मौसम का ही हाल नहीं बताया, बल्कि यह भी साबित किया है कि हमारा मानसून दुनिया के दूसरे हिस्सों से कैसे जुड़ा है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि पूर्वोत्तर भारत में बारिश के ये पैटर्न उत्तरी अटलांटिक महासागर में होने वाले जलवायु परिवर्तनों (जिन्हें बॉन्ड इवेंट्स 8, 7, 6, 5बी, 5एक और 4 कहा जाता है) और अटलांटिक महासागर की दक्षिणी-उत्तरी जल परिसंचरण प्रणाली ‘एएमओसी’ के साथ तालमेल बिठाते हैं।

इसके अलावा इस अध्ययन में लगभग 118 और 110 साल के अंतराल पर दोहराए जाने वाले जलवायु चक्रों का भी पता चला है, जो सीधे तौर पर सूर्य की गतिविधियों में दीर्घकालिक परिवर्तनों यानी ‘ग्लीसबर्ग सोलर साइकल’ से जुड़े हैं।

साथ ही, ‘पैसिफिक डेकेडल ऑसिलेशन’ (पीडीओ), महासागर-वायुमंडल प्रणाली और तिब्बती पठार व हिंद महासागर के बीच के तापमान के अंतर ने भी मिलकर इस अवधि में मानसून की तीव्रता को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई।

शिलांग से करीब 60 किलोमीटर दक्षिण में पूर्वी खासी हिल जिले की इस गुफा के भीतर नमी हमेशा 95 प्रतिशत से ऊपर रहती है जहां लगभग 300 मीटर अंदर एक चैंबर से इस नमूने को एकत्र किया गया था। वैज्ञानिकों के अनुसार, पारंपरिक भू-रासायनिक साक्ष्यों के साथ पेट्रोग्राफिक संबंधी साक्ष्यों को एकीकृत करने से प्रागैतिहासिक काल की जलवायु को समझने में एक नया आयाम मिला है।

क्षेत्रीय कार्य के दौरान बी. डी. खार्पन डाली के नेतृत्व वाली ‘मेघालयन एडवेंचर एसोसिएशन’ के साथ-साथ क्शन कुपर मावलोंग और किरमेन खेंभा रानी ने इसमें सहयोग किया था। साथ ही, आइसोटोप विश्लेषण के लिए कोलकाता स्थित आईआईएसईआर और पेट्रोग्राफिक विश्लेषण के लिए आईआईटी खड़गपुर ने सुविधाएं उपलब्ध कराई थीं।

भाषा खारी रंजन

रंजन