नयी दिल्ली, दो जून (भाषा) राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने प्रयागराज और कानपुर के बीच गंगा-यमुना दोआब में 200 किलोमीटर लंबी पुराधारा या ‘पैलियोचैनल’ के किनारे 150 से अधिक संभावित भूजल पुनर्भरण स्थलों की पहचान की है। इसके साथ ही उसने उत्तर प्रदेश के तीन जिलों में पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण शुरू किया है।
पुरा जलधारा सतह से 10 से 15 मीटर नीचे स्थित है और प्रयागराज और कानपुर के बीच गंगा और यमुना नदियों के बीच एक घुमावदार मोड़ के साथ बहती थी।
हैदराबाद स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है कि प्राचीन नदी प्रणाली और इसकी भूमिगत संरचना अब भी गंगा और यमुना के भूजल भंडारों को जोड़ती है, जिसका अर्थ है कि एक प्रणाली में पुनर्भरण दूसरी प्रणाली को प्रभावित कर सकता है।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि इसकी चौड़ाई, गहराई और तल स्तर दोनों नदियों के समान हैं।
एनएमसीजी के अनुसार, इसकी कार्यकारी समिति ने नवंबर 2025 में प्रयागराज-कानपुर खंड में खोजी गई प्राचीन जलधारा के प्रबंधित जल पुनर्भरण (एमएआर) पर 2.43 करोड़ रुपये की लागत से एक अध्ययन को मंजूरी दी थी।
इस अध्ययन का उद्देश्य कौशांबी और कानपुर के बीच स्थित प्राचीन जलधारा के किनारे उपयुक्त सरकारी भूमि की पहचान करना और वैज्ञानिक रूप से डिजाइन की गई एमएआर संरचनाओं, जैसे कि पुनर्भरण गड्ढे का निर्माण करना है।
एनएमसीजी के अनुसार कानपुर, फतेहपुर और कौशांबी पहले तीन जिले हैं जहां परियोजना का कार्यान्वयन शुरू हो चुका है। वहां एमएआर प्रणालियों का निर्माण कार्य पहले से ही चल रहा है। इन संरचनाओं का उद्देश्य वैज्ञानिक रूप से पहचाने गए पुनर्भरण बिंदुओं के माध्यम से पानी को भूमिगत जलभंडारों में पहुंचाना है।
अधिकारियों ने बताया कि जिला प्रशासन, जिला गंगा समितियों के माध्यम से, परियोजना के स्थानीय कार्यान्वयन की देखरेख कर रहा है। एनएमसीजी ने कहा कि इस योजना के तहत अंततः संपूर्ण प्राचीन जलधारा को शामिल किया जाएगा।
नमामि गंगे मिशन ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘ एनएमसीजी कोई शोध परियोजना नहीं चला रहा है। यह सबसे सटीक विज्ञान पर आधारित एक नदी पुनर्स्थापन कार्यक्रम है, और यह सुनिश्चित कर रहा है कि विज्ञान जमीन तक पहुंचे।’’
जल शक्ति मंत्रालय और केंद्रीय भूजल बोर्ड के सहयोग से सीएसआईआर-एनजीआरआई द्वारा किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद पुनर्भरण स्थलों की पहचान की गई।
वैज्ञानिकों ने गंगा-यमुना दोआब में भूमिगत भूवैज्ञानिक संरचनाओं का मानचित्रण करने के लिए हेलीकॉप्टर आधारित भूभौतिकीय संवेदी उपकरणों का इस्तेमाल किया और जमीनी स्तर पर खुदाई की।
सर्वेक्षण में सामने आया कि प्रयागराज से कानपुर तक विशाल प्राचीन नदी मार्ग है, जो तलछटों के नीचे दबा हुआ है।
भाषा धीरज अविनाश
अविनाश