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न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर न्यायपालिका से कोई टकराव नहीं है : कानून मंत्री मेघवाल

नयी दिल्ली, 31 मई (भाषा) केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा है कि सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए विभिन्न देशों में अपनाई जाने वाली प्रणालियों का अध्ययन कर रही है।

मेघवाल ने इस बात पर जोर दिया कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच कोई टकराव नहीं है और उच्च न्यायपालिका में रिक्त पदों को भरने के लिए एक अच्छी परामर्श प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि अदालतों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर, सरकार वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को मजबूत करने के लिए काम कर रही है।

मेघवाल ने कहा कि उच्चतम न्यायालय, 25 उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में पांच करोड़ से अधिक मामले लंबित होने के मद्देनजर, नरेन्द्र मोदी नीत सरकार इसे कम करने के लिए मध्यस्थता सहित वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को बढ़ावा दे रही है।

मेघवाल ने ‘पीटीआई-भाषा’ के साथ साक्षात्कार में कहा कि सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति में विभिन्न देशों द्वारा अपनाई गई प्रणालियों का अध्ययन कर रही है।

हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि अन्य देशों में नियुक्ति प्रणालियों की अनौपचारिक रूप से जांच की जा रही है और उनका अध्ययन करने के लिए कोई औपचारिक तंत्र स्थापित नहीं किया गया है।

कॉलेजियम प्रणाली के विकल्प की संभावना के बारे में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में मेघवाल ने कहा, ‘‘देखते हैं इसका क्या परिणाम निकलता है।’’

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच मतभेदों से संबंधित प्रश्न पर मेघवाल ने कहा कि ‘‘कोई टकराव नहीं है और अच्छी परामर्श प्रक्रिया’’ होती है।

उन्होंने कहा, ‘‘सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहता हूं कि कोई टकराव नहीं है और अच्छी परामर्श प्रक्रिया का पालन होता है।’’

कानून मंत्री ने कहा कि ऐसे अवसर भी आते हैं, जब उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम सरकार द्वारा सुझाए गए नामों पर असहमत होता है। इसी प्रकार, सरकार भी जांच में नकारात्मक पृष्ठभूमि जैसे कारणों से अपनी सिफारिशें रोक लेती है। उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन, कोई टकराव नहीं है।’’

संसद के दोनों सदनों ने लगभग सर्वसम्मति से एक विधेयक पारित किया था, जिसमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक निकाय स्थापित करके कॉलेजियम प्रणाली को समाप्त करने का प्रस्ताव था।

हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने 16 अक्टूबर, 2015 को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम और 99वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम को ‘‘असंवैधानिक और अमान्य’’ घोषित करते हुए रद्द कर दिया था।

भाषा शफीक दिलीप

दिलीप