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साइबर अपराध के मामलों में याचिकाओं का आकलन निजी शिकायतों तक सीमित नहीं होना चाहिए: सीजेआई

नयी दिल्ली, 20 अप्रैल (भाषा) प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि संगठित साइबर अपराध नेटवर्क से जुड़े मामलों में अदालतों को जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय केवल व्यक्तिगत शिकायतों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ऐसे आरोपों को संगठित आपराधिक गतिविधियों के व्यापक ढांचे के भीतर रखकर देखना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि इस दौरान ऐसे नेटवर्क के पैमाने, आपसी समन्वय और उनके संभावित निरंतर प्रभाव को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

सीजेआई ने यह भी सुझाव दिया कि विदेशी खातों में होने वाले धन के अंतरण को सत्यापन के लिए कुछ समय तक रोका जा सकता है, ताकि खाताधारक की पहचान की जांच हो सके और देश में साइबर अपराधियों पर रोक लगाई जा सके। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इस तरह की कार्रवाई से वैध कारोबारों को बचाए रखा जाना चाहिए।

सीजेआई ने ‘‘साइबर अपराध की चुनौतियां - पुलिस और न्यायपालिका की भूमिका' विषय पर आयोजित 22वें डी पी कोहली स्मृति व्याख्यान में यह बात कही। यह वार्षिक कार्यक्रम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के संस्थापक निदेशक के संस्थापक निदेशक डी पी कोहली की याद में आयोजित किया जाता है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि साइबर अपराध केवल आर्थिक अपराध नहीं हैं, बल्कि ‘‘मानव गरिमा के खिलाफ अपराध’’ हैं, जो व्यवस्था में लोगों के विश्वास को नुकसान पहुंचाते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘इसके साथ ही ऐसे मामलों में जमानत संबंधी न्यायशास्त्र का विकसित होता पहलू भी जुड़ा हुआ है। जहां किसी आरोपी पर संगठित साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क का हिस्सा होने का आरोप हो, वहां मूल्यांकन केवल किसी एक व्यक्तिगत शिकायत के तथ्यों तक सीमित नहीं रह सकता क्योंकि यह अक्सर कई क्षेत्रों में फैला होता है और इसमें अनेक पीड़ित शामिल होते हैं।’’

उन्होंने कहा, “अदालतों को ऐसे आरोपों को संगठित आपराधिक गतिविधियों के व्यापक ढांचे के भीतर रखकर देखना पड़ सकता है, जिसमें ऐसे नेटवर्क के पैमाने, आपसी समन्वय और उनके संभावित निरंतर प्रभाव को ध्यान में रखा जाए।”

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि न्याय के मूल सिद्धांत—निष्पक्षता, प्राकृतिक न्याय और जवाबदेही—अक्षुण्ण बने रहें।

उन्होंने कहा, 'चुनौती इन सिद्धांतों को त्यागने की नहीं है, बल्कि बदले संदर्भ में उन्हें सार्थक रूप से लागू करने की है।'

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अदालतों को न केवल कानूनी ज्ञान बल्कि तकनीकी समझ से भी लैस होना चाहिए। उन्होंने कहा, 'कानूनी प्रक्रियाएं, स्वभाव से ही विचार-विमर्श पर आधारित होती हैं। इसके विपरीत, प्रौद्योगिकी तेजी से विकसित होती है। इस अंतर को पाटने के लिए प्रक्रियात्मक, संस्थागत और बौद्धिक नवाचार की आवश्यकता है।'

प्रधान न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि 2024 और 2025 में भारत से साइबर अपराधियों द्वारा 44,000 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी की गई। उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय के अनुसार “डिजिटल अरेस्ट” धोखाधड़ी के जरिए 30,000 करोड़ रुपये की ठगी हुई। उन्होंने कहा कि ठगी गई कुल राशि में से मुश्किल से 10 प्रतिशत रकम का ही पता लगाया जा सका या उसे वापस हासिल किया जा सका है।

भाषा आशीष दिलीप

दिलीप