मरीजों को दवाएं उचित कीमत पर उपलब्ध कराने और अस्पतालों में दवा की कीमतों में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (यूपीएफएसडीए) ने राष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप की मांग की है। यूपीएफएसडीए की आयुक्त एवं सचिव डॉ. रोशन जैकब ने नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) को पत्र भेजकर दवाओं की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच बड़े अंतर पर प्रभावी नियामकीय कार्रवाई का अनुरोध किया है।
दरअसल, यूपीएफएसडीए ने प्रदेश के प्रमुख शहरों में 22 मेडिकल कॉलेजों और 30 सरकारी व निजी अस्पतालों की 200 से अधिक फार्मेसियों का निरीक्षण किया था। जांच में दवाओं, कंज्यूमेबल्स, मेडिकल डिवाइस और न्यूट्रास्यूटिकल्स की अस्पताल खरीद कीमत यानी प्राइस टू रिटेलर (PTR) और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच कई मामलों में बड़ा अंतर सामने आया। कुछ मामलों में यह अंतर 67 गुना तक पाया गया।
मरीजों तक पहुंचे अस्पताल की खरीद का लाभ
यूपीएफएसडीए ने सवाल उठाया है कि अगर अस्पताल किसी दवा को निर्माता या सप्लायर से भारी छूट पर खरीदता है तो उस खरीद का लाभ मरीज को कितना मिल रहा है। मौजूदा व्यवस्था में दवाओं की पैकेजिंग पर एमआरपी दर्ज होती है, जबकि अस्पतालों की संस्थागत खरीद में अक्सर अधिकतम छूट के आधार पर सौदे होते हैं।
ऐसे में अस्पताल की वास्तविक खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच का अंतर मरीज के लिए स्पष्ट नहीं रहता। विभाग के अनुसार, इससे एमआरपी को अपेक्षाकृत अधिक रखने और उस पर बड़ी छूट दिखाने की गुंजाइश बन सकती है, जबकि वास्तविक खरीद का लाभ मरीज तक नहीं पहुंचता।
अस्पताल फार्मेसियों में कीमतों की जानकारी सार्वजनिक करने के निर्देश
यूपीएफएसडीए ने एनपीपीए को 1 अक्टूबर 2026 को जारी अपने आदेश की भी जानकारी दी है। इसके तहत अस्पताल आधारित फार्मेसियों को अपनी वेबसाइट पर प्राइस टू रिटेलर (PTR) और प्राइस टू कंज्यूमर (PTC) से जुड़ी जानकारी स्वैच्छिक रूप से सार्वजनिक करने के लिए निर्देशित किया गया है।
इसके साथ ही फार्मेसी लाइसेंस, डिस्पेंसिंग फार्मासिस्ट, स्टॉक की स्थिति और मूल्य सूची जैसी जानकारी भी वेबसाइट पर उपलब्ध और अपडेट रखने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य मरीजों और उनके परिजनों को दवाओं की कीमत से जुड़ी जानकारी आसानी से उपलब्ध कराना है।
सरकारी मेडिकल कॉलेजों के 'कॉस्ट प्लस' मॉडल का उदाहरण
यूपीएफएसडीए ने एनपीपीए को बताया कि उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में महंगे इंजेक्शन, हाई-एंड एंटीबायोटिक्स और कैंसर की दवाओं के मामले में 'कॉस्ट प्लस' मॉडल का उदाहरण मौजूद है।
इस मॉडल में केवल दवा की मुद्रित एमआरपी को आधार बनाने के बजाय अस्पताल की वास्तविक खरीद लागत को ध्यान में रखते हुए मरीज से ली जाने वाली कीमत तय करने का प्रयास किया जाता है। विभाग का जोर इस बात पर है कि मरीज को केवल एमआरपी पर दिखाई जाने वाली छूट का लाभ नहीं, बल्कि अस्पताल की वास्तविक खरीद कीमत का फायदा भी मिले।
एक ही ब्रांड की दवा पर अलग-अलग एमआरपी पर चिंता
एनपीपीए को भेजे पत्र में यूपीएफएसडीए ने एक ही निर्माता और ब्रांड की दवा की अलग-अलग संस्थागत आपूर्ति में अलग-अलग एमआरपी होने की स्थिति पर भी चिंता जताई है। विभाग ने कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के जरिए अस्पतालों को ऐसे ब्रांड उपलब्ध कराए जाने का भी उल्लेख किया है, जो सामान्य रिटेल बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं होते। इससे मरीजों के विकल्प सीमित होने और अस्पताल की सप्लाई चेन पर निर्भरता बढ़ने की आशंका है।
एनपीपीए से चार बड़े बदलावों पर विचार का अनुरोध
यूपीएफएसडीए ने एनपीपीए से मुख्य रूप से चार स्तरों पर कार्रवाई पर विचार करने का अनुरोध किया है।
- हाई-एमआरपी दवाओं और मेडिकल डिवाइस पर ट्रेड मार्जिन कैपिंग: सप्लाई चेन में ट्रेड मार्जिन की समीक्षा कर जरूरत के अनुसार अधिकतम मार्जिन तय किया जाए।
- एमआरपी निर्धारण की प्रक्रिया को तर्कसंगत बनाना: निर्माता की लागत और अनुमन्य पोस्ट-मैन्युफैक्चरिंग खर्च को ध्यान में रखते हुए रिटेल मूल्य तय करने की व्यवस्था पर विचार किया जाए।
- हाई-मार्जिन अस्पताल आपूर्ति वाली दवाओं को मूल्य नियंत्रण में लाना: अत्यधिक मार्जिन वाली अस्पताल आपूर्ति की दवाओं को डीपीसीओ-2013 के मूल्य नियंत्रित शेड्यूल में शामिल करने पर विचार किया जाए।
- डीपीसीओ उल्लंघन पर नियामकीय कार्रवाई मजबूत करना: डीपीसीओ के प्रावधानों के क्रियान्वयन और उल्लंघन पर प्रभावी कार्रवाई के लिए मौजूदा कानूनी व्यवस्था को मजबूत करने पर विचार किया जाए।
यूपीएफएसडीए का कहना है कि दवाओं की खरीद कीमत, एमआरपी और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच पारदर्शिता बढ़ाना जरूरी है, ताकि अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीजों को दवाओं की वास्तविक कीमत व्यवस्था की स्पष्ट जानकारी मिल सके।