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मृतक के बैंक खातों की जानकारी उनके वारिसों को क्यों नहीं दी जा सकती? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा

New Delhi: सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक से पूछा कि मृत व्यक्तियों के बैंक खातों की जानकारी उनके वारिसों को क्यों नहीं दी जा सकती, और कहा कि सरकार को इस मुद्दे पर एक नीति बनानी होगी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ पत्रकार सुचेता दलाल द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मृत जमाकर्ताओं के कानूनी वारिसों को बैंक खातों में निष्क्रिय पड़े लावारिस जमाओं के बारे में सूचित करने के लिए एक तंत्र बनाने का आदेश देने की मांग की गई थी।

पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा, “मान लीजिए किसी व्यक्ति के अलग-अलग देशों में 10 खाते हैं, उसकी बिना वसीयत बनाए मृत्यु हो जाती है, तो उसके वारिसों को ये विवरण कैसे मिलेंगे? हो सकता है उसने केवाईसी (पहचान सत्यापन) न कराया हो..."

उन्होंने आगे कहा, “ये नीति का प्रश्न नहीं है; हम ये नहीं कह रहे हैं कि हस्तांतरण अवैध है। हम ये कह रहे हैं कि अगर हम कानूनी वारिसों को जानकारी देते हैं तो इसमें क्या गलत है? आपको कोई नीति बनानी होगी।” सुनवाई के दौरान दलाल की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने बताया कि याचिकाकर्ता ने ऐसे लावारिस खातों का विवरण सार्वजनिक करने के निर्देश मांगे हैं।

उन्होंने कहा कि आरबीआई ने भी एक “केंद्रीकृत और खोज योग्य डेटाबेस” की जरूरत की सिफारिश की है ताकि लोग अपने मृत माता-पिता के खातों का पता लगा सकें। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने कहा कि अगर कोई वास्तविक वारिस सामने आता है, तो जमाकर्ता शिक्षा एवं जागरूकता कोष से उन्हें राशि वापस कर दी जाती है।

आरबीआई की ओर से 2014 में स्थापित जमाकर्ता शिक्षा एवं जागरूकता कोष में वाणिज्यिक और सहकारी बैंकों की लावारिस जमा राशि रखी जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और आरबीआई को इस मामले में नए हलफनामे दाखिल करने को कहा और मामले की सुनवाई पांच मई को तय की।

सर्वोच्च न्यायालय ने इससे पहले वित्त मंत्रालय को उस जनहित याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा था जिसमें मृत व्यक्तियों के बैंक खातों, बीमा, जमा और डाकघर निधियों से संबंधित जानकारी प्रदान करने वाला एक केंद्रीकृत डेटाबेस बनाने के निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिका में ये निर्देश देने की भी मांग की गई है कि बैंक जमा, बीमा, डाकघर निधि आदि से संबंधित कानूनी वारिसों के दावों से निपटने के दौरान अनावश्यक मुकदमेबाजी को खत्म करने वाली प्रक्रिया स्थापित की जाए।

याचिका में कहा गया है कि जमाकर्ता शिक्षा एवं जागरूकता कोष में मार्च 2021 के अंत में 39,264.25 करोड़ रुपये थे, जो 31 मार्च 2020 को 33,114 करोड़ रुपये और मार्च 2019 के अंत में 18,381 करोड़ रुपये से काफी अधिक हैं।

याचिका में कहा गया है कि आरबीआई के नियंत्रण में एक केंद्रीकृत ऑनलाइन डेटाबेस विकसित करने की तत्काल जरूरत है, जो मृतक खाताधारक के बारे में जानकारी देगी। जिसमें मृतक खाताधारक का नाम, पता और उसके द्वारा किए गए अंतिम लेनदेन की तारीख जैसे विवरण शामिल होंगे।