Rajasthan: राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मांडल कस्बे में साल 1614 में मुगल बादशाह शाहजहां के मनोरंजन के लिए 'नाहर' नृत्य शुरू किया गया था। तब से हर साल होली के कुछ दिनों बाद राजस्थान के नाहर कस्बे में इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है।
नाहर नाम 'नरसिम्हा' से लिया गया है, जो आधे शेर और आधे मनुष्य थे। 'राम' और 'राज' के सम्मुख ही प्रस्तुत किया जाने वाला ये 'नाहर' नृत्य देश में एक अनूठा है। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों के बीच पुरुष अपने शरीर पर रुई लपेटकर शेर का स्वांग रचते हुए नृत्य करते हैं।
इस नृत्य की उत्पत्ति तब हुई जब राजकुमार खुर्रम मेवाड़ के राजा से मिलने के लिए एक राजनयिक मिशन पर थे और मंडल में कुछ समय के लिए रुके थे। ग्रामीणों ने मुगल शाही परिवार का स्वागत करने के लिए ये नृत्य किया था।
'नाहर' नृत्य करने वाले कलाकार बताते हैं कि इस परंपरा को 413 साल हो चुके हैं। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती जा रही है। पूरे गांव में इसे लेकर जोरदार उत्साह रहता है। यह परंपरा उनके पूर्वजों द्वारा शुरू की गई थी, जिसे पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।