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Punjab: हरियाणा हाई कोर्ट ने पंचकूला भूखंड मामले में हुड्डा, एजेएल के खिलाफ आरोप किए खारिज

Punjab: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पंचकूला में एक भूखंड के पुन: आवंटन के सिलसिले में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) के खिलाफ आपराधिक आरोप खारिज कर दिए हैं। न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया की पीठ ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत के अप्रैल 2021 के आदेश को खारिज कर दिया, जिसने आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे और उन्हें बरी करने की याचिकाओं को खारिज कर दिया था।

अपने फैसले में, उच्च न्यायालय ने कहा कि रिकॉर्ड में पेश की गई जानकारी से याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कथित अपराधों के आवश्यक पहलू प्रथम दृष्टया साबित नहीं होते हैं।
अदालत ने कहा कि इस मामले में उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं थे।

अदालत के 25 फरवरी के आदेश के मुताबिक, ‘‘मुकदमा जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग करना होगा। याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आरोप तय करने और बरी करने के आवेदन को खारिज करने वाले 16 अप्रैल, 2021 के आदेश और उससे संबंधित बाद की सभी कार्रवाई को खारिज किया जाता है और याचिकाकर्ताओं को बरी किया जाता है।’’

ये मामला हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (हुडा) द्वारा 1982 में एजेएल को पंचकूला के सेक्टर 6 में एक भूखंड आवंटित करने से संबंधित है। तय समय में निर्माण पूरा नहीं होने पर 1992 में भूखंड वापस ले लिया गया था।

हुडा (प्राधिकरण) ने 1995 और 1996 में एजेएल की इसके खिलाफ अपील खारिज कर दी थी। हुड्डा के 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद, भूखंड को एजेएल को मूल दर पर फिर से आवंटित कर दिया गया। राज्य में बीजेपी के शासन के दौरान, राज्य सतर्कता ब्यूरो ने 2016 में एक मामला दर्ज किया, और बाद में इसे सीबीआई ने अपने हाथ में ले लिया।

आरोप था कि भूखंड के दोबारा आवंटन से सरकारी खजाने को वित्तीय नुकसान हुआ। अप्रैल 2021 में, विशेष सीबीआई अदालत ने हुड्डा और नेशनल हेराल्ड के प्रकाशक एजेएल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) और 420 (धोखाधड़ी) तथा भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोप तय करने का आदेश दिया था।

इसके बाद, हुड्डा ने उच्च न्यायालय में विशेष सीबीआई अदालत के आदेश को चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि प्राधिकरण के सोच-समझकर लिए गए फैसले को उसके सदस्यों के बाद के बयानों के आधार पर बेमतलब और फर्जी नहीं कहा जा सकता, जिन्होंने बिना किसी संदेह और आपत्ति के उससे सहमति जताई थी।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘ये बात कि सीबीआई ने फैसले को मंजूरी देने वाले बाकी सभी सदस्यों को नजरअंदाज करके, प्राधिकरण के अध्यक्ष हुड्डा के खिलाफ ही आरोप पत्र दायर करने का फैसला किया है, इससे भी सीबीआई की नेकनीयत और की गई जांच के तरीके पर शक होता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘इससे वकील आर एस चीमा की इस बात को बल मिलता है कि हुड्डा को इस मामले में गलत इरादों से फंसाया गया है।’’