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वन अधिकार अधिनियम से बदली ज़िंदगी, गोवा में आदिवासी और ग़ैर-आदिवासी परिवारों को मिला कानूनी हक़

Goa: दक्षिणी गोवा का धरबंदोरा तालुका, ये वन संरक्षित वो इलाका है जहां पहले सिर्फ आदिवासी समुदाय का अधिकार माना जाता था, लेकिन अब ग़ैर आदिवासियों के  लिए भी जंगल के द्वार खुल गए हैं। विशांत रंगनाथ की कई पीढ़ियों ने जंगल के इस हिस्से पर अपना जीवन बिताया। अब विशांत अपने पूर्वजों की इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन जंगल की ज़मीन पर अब उन्हें कानूनी अधिकार भी मिल गया है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल, और गोवा की डॉक्टर प्रमोद सावंत सरकार ने, वन अधिकार अधिनियम- 2006 के तहत उनके संघर्षों को मान्यता दे दी है।

दरअसल, पहले ऐसा माना जाता था कि वन अधिकार अधिनियम आदिवासियों को ही भूमि पर अधिकार देने के लिए है, लेकिन अब गैर आदिवासी और सभी धर्मों के लोगों को इसका फायदा मिल रहा है। गोवा के धरबंदोरा तालुका की बबिता नागेश को भी इसका लाभ मिला है। 

गोवा में वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत सरकार को 10,000 से ज़्यादा दावे प्राप्त हुए हैं, जिनमें से 4,000 से ज़्यादा गैर-आदिवासी समूहों से हैं। जिन्हें निपटाने के लिए तेजी से प्रक्रिया की जा रही है। अकेले धारबंदोरा तालुका में निपटाए गए में से 761 अनुसूचित जनजाति के हैं, जबकि 964 गैर-अनुसूचित जनजाति के लाभार्थी हैं। 

वन अधिकार अधिनियम में व्यक्तिगत और सामुदायिक दावे होते हैं। व्यक्तिगत दावों में आदिवासी आबादी शामिल है जो अपने दावे कर सकती हैं और उसके बाद ओटीएफडी यानी अन्य पारंपरिक वनवासी आते हैं। यानी धर्म, जाति या भाषा से परे, वनों पर निर्भर लोग अब अपने अधिकारों के हकदार हैं।