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तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त आज, क्या है विवाह का शुभ मुहूर्त?

देवउठनी एकादशी, कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। इस साल देवउठनी यानी देवप्रबोधिनी एकादशी 12 नवंबर, मंगलवार को है। देवउठनी एकादशी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की नींद के बाद जागते हैं। देवउठनी एकादशी की शाम तुलसी विवाह भी किया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार देवउठनी एकादशी पर तुलसी जी का विवाह शालिग्राम से किया जाता है। आप भी अगर तुलसी विवाह का आयोजन कर रहे हैं, तो आपको तुलसी विवाह के कुछ विशेष नियमों का ध्यान रखना चाहिए। कुछ विशेष नियमों के बिना तुलसी विवाह संपन्न नहीं माना जाता है। 

सुबह जल्दी ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें, फिर शंख और घंटा बजाकर भगवान विष्णु की पूजा शुरू करें। ऐसा करने से आपका दिन शुभ होगा और आसपास का वातावरण भी पवित्र बनेगा। विष्णु जी शालिग्राम का रूप हैं इसलिए विष्णु जी को उठाने का नियम सबसे महत्वपूर्ण हैं। विष्णु जी को निद्रा से जगाने के बाद उनकी विधि-विधान के साथ पूजा करनी चाहिए और उनकी आरती उतारनी चाहिए।

शालिग्राम और तुलसी विवाह का सबसे उत्तम समय गोधूलि वेला है। गोधूलि वेला सूर्यास्त के बाद का समय होता है. यह समय शाम 05 से 07 बजे के बीच होता है। इस समय गायें अपने घर लौटती हैं और घर में मां लक्ष्मी के आगमन होता है। गोधूलि वेला पर भगवान शालिग्राम और माता तुलसी का विवाह होता है। यह एक पवित्र समय माना जाता है।

आधुनिक समय में कई रंगीन सजावटी चीजों से विवाह मंडप को सजाया जाता है लेकिन तुलसी विवाह में मंडप सजाने का ऐसा विशेष नियम है, जिसका ध्यान रखना बहुत जरूरी है। तुलसी विवाह के लिए चौकी और विवाह मंडप को गन्ने और केले के पत्तों से सजाना चाहिए। मंडप को सजाकर कलश स्थापित करना चाहिए। विवाह मंडप को सजाने के लिए केले के पत्ते और गण्णे को शुभ माना जाता है।

तुलसी विवाह की सारी रस्में करते समय मंत्रोच्चारण के बाद मंगल गीत भी गाए जाते हैं। तुलसी विवाह के दौरान आपस में बातचीत करने की बजाय मंगल और विवाह गीत गाए जाते हैं, जिससे कि वातावरण में नकारात्मकता न रहे और आसपास के वातावरण में उत्साह नजर आ सके। फेरों के पश्चात मंगलाष्टक पाठ करना चाहिए।

तुलसी विवाह से जुड़ा यह नियम बहुत महत्वपूर्ण है। तुलसी जी और शालिग्राम के फेरे करते समय आपको आसन सहित ही तुलसी जी और शालिग्राम के फेरे कराने चाहिए। विवाह के दौरान तुलसी जी को आसन से नहीं हटाएं। विवाह की हर रस्म को आसन सहित ही संपन्न किया जाना चाहिए। तुलसी जी के शालिग्राम से सात फेरे कराएं। सात फेरों के बाद प्रतीकात्मक रूप से तुलसी जी की डोली भी मंडप के पास रख दें।

फेरों के बाद आपको तुलसी जी और शालिग्राम जी की आरती जरूर उतारनी चाहिए। इसके बाद सपरिवार भगवान विष्णु और तुलसी माता को प्रणाम करें। इसे बहुत शुभ माना जाता है। फिर प्रसाद बांटें। प्रसाद भक्ति का प्रतीक है और परिवार में एकता और प्यार बढ़ाता है। प्रसाद खाने से मन में सकारात्मकता आती है।