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पश्चिम एशिया तनाव से बढ़ा ऊर्जा संकट, कच्चे तेल से ज्यादा रिफाइंड फ्यूल की किल्लत का खतरा

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी उथल-पुथल अब कच्चे तेल से ज्यादा रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के लिए बड़ा संकट बन सकती है। पीएल कैपिटल की रिपोर्ट के अनुसार, जहां कच्चे तेल का उत्पादन अपेक्षाकृत जल्दी दोबारा शुरू किया जा सकता है, वहीं रिफाइनरी बंद होने, इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान और लॉजिस्टिक समस्याओं के चलते रिफाइंड उत्पादों की कमी लंबे समय तक बनी रह सकती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 1 अप्रैल 2026 तक वैश्विक तेल बाजार में करीब 10 मिलियन बैरल प्रति दिन की सप्लाई गैप बनने की आशंका है। खासकर मिडिल ईस्ट के पांच बड़े उत्पादक देश, जो करीब 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल और लगभग 5 मिलियन बैरल रिफाइनिंग क्षमता रखते हैं, वहां किसी भी तरह की बाधा का वैश्विक बाजार पर गहरा असर पड़ सकता है।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऑस्ट्रेलिया के सिडनी जैसे शहर में पहले ही करीब 10 लाख बैरल की कमी देखी जा रही है। इसके अलावा, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधा से हालात और बिगड़ सकते हैं, जिससे रिफाइंड फ्यूल की सप्लाई पर गहरा असर पड़ेगा।

भारत के लिए यह संकट और भी गंभीर हो सकता है, क्योंकि देश अपनी एलपीजी जरूरतों के लिए मिडिल ईस्ट पर काफी निर्भर है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के करीब 50-60% एलपीजी आयात स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए होते हैं। ऐसे में सप्लाई बाधित होने से देश में एलपीजी की भारी कमी हो सकती है, जो आम लोगों और सरकार दोनों के लिए संवेदनशील मुद्दा है।

वहीं, सरकार स्थिति को संभालने के प्रयास कर रही है, लेकिन होर्मुज मार्ग में रुकावट के कारण आयात में आई कमी की पूरी भरपाई करना मुश्किल होगा। कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में कच्चे तेल की उपलब्धता कुछ हद तक संभली हुई है, लेकिन रिफाइंड उत्पाद, खासकर एलपीजी, सबसे ज्यादा दबाव में हैं।