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कड़ाके की ठंड से पूरे कश्मीर में बढ़ी फेरन की मांग

पूरे कश्मीर में बढ़ती ठंड से सदियों पुराने पारंपरिक पहनावे फेरन की मांग भी बढ़ रही है। सिर्फ कश्मीर में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में इसकी मांग बढ़ी है। सर्दियों के लिए जरूरी फेरन कश्मीरी पहचान, सांस्कृतिक विरासत और कुशल कारीगरी का प्रतीक है। कई लोग मानते हैं कि फेरन पहनावे से ज्यादा बेहतरीन कारीगरी का नमूना है। कश्मीर घाटी के बाजारों में फेरन बनाने वाले बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए लगातार काम कर रहे हैं।

बारीक कढ़ाई वाले हाथ से बने फेरन पूरे देश के बाजारों में बेहद पसंद किए जाते हैं। फेरन के साथ-साथ कश्मीर के हाथ से बने शॉल पारंपरिक हुनर ​​और बारीकियों को प्रदर्शित करते हैं, जिसकी बराबरी बड़े पैमाने पर मशीन से बने शॉल नहीं कर सकते। स्थानीय ऊन और बारीकी से हाथ की कढ़ाई वाले कपड़े को बनाने में तीन दिन तक लग जाते हैं। कारीगरों के लिए ये काम सिर्फ रोज़ी-रोटी का जरिया नहीं है, बल्कि कश्मीर की समृद्ध विरासत को बचाने का एक तरीका भी है। सर्दियों के बढ़ने के साथ कश्मीर के पारंपरिक फेरन का फिर से चलन रचनात्मकता, साहस और सांस्कृतिक गौरव की कहानी बन गया है।