उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर, भारत के चार प्रमुख धामों में से एक है। यह मंदिर अपनी अनोखी और रहस्यमयी परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा की मूर्तियां पत्थर की नहीं, बल्कि नीम की लकड़ी से बनी होती हैं — जो भारत में अपने आप में एक अनोखी परंपरा है। हर 12 साल में इन मूर्तियों को बदला जाता है। इस प्रक्रिया को "नवकलेवर" कहा जाता है, जिसका अर्थ है भगवान का नया शरीर या रूप। यह मूर्ति-परिवर्तन एक साधारण प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक अत्यंत पवित्र और गुप्त अनुष्ठान होता है। इसके लिए चुने गए नीम के पेड़ को 100 साल पुराना, पूर्ण रूप से दोषरहित और विशेष आध्यात्मिक संकेतों वाला होना चाहिए। यह पेड़ पुजारी शास्त्रों में वर्णित संकेतों और स्वप्नों के आधार पर ढूंढते हैं।
'ब्रह्म पदार्थ' भगवान का 'दिल'
नवकलेवर की सबसे रहस्यमयी और चमत्कारी बात है पुरानी मूर्तियों से निकाला जाने वाला 'ब्रह्म पदार्थ', जिसे भगवान का ‘दिल’ माना जाता है। यह तत्व नई मूर्तियों में स्थानांतरित किया जाता है। यह प्रक्रिया इतनी गुप्त और पवित्र मानी जाती है कि इसे रात में किया जाता है, जब पूरे पुरी शहर की बिजली बंद कर दी जाती है, और पुजारी आंखों पर पट्टी बांधकर इस अनुष्ठान को पूर्ण करते हैं। कहा जाता है कि यह 'ब्रह्म तत्व' भगवान श्रीकृष्ण के शरीर का वह हिस्सा है, जो द्वारका में उनके अंतिम संस्कार के बाद भी नष्ट नहीं हुआ था।
रथ यात्रा 2025: आस्था और भक्ति का महासागर
इस वर्ष जगन्नाथ रथ यात्रा 27 जून 2025 को निकाली जाएगी। इस भव्य यात्रा में लाखों श्रद्धालु भाग लेंगे, जब तीन विशाल रथों में भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियाँ नगर भ्रमण के लिए निकलेंगी। यह यात्रा भक्ति, रहस्य और परंपरा का अद्भुत संगम होती है।