मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने मछली पकड़ने पर प्रतिबंध (फिशिंग बैन) के दौरान मछुआरों को दिए जाने वाले मुआवजे में बढ़ोतरी की मांग संबंधी जनहित याचिका (PIL) पर तमिलनाडु सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने राज्य सरकार को इस मामले में काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह याचिका नाम तमिलर कच्ची (NTK) के मछुआरा प्रकोष्ठ के राज्य समन्वयक और अधिवक्ता जी. तिरुमुरुगन ने दायर की है। याचिका में कहा गया है कि तमिलनाडु सरकार हर वर्ष 15 अप्रैल से 14 जून तक 61 दिनों का मछली पकड़ने पर प्रतिबंध लगाती है, ताकि मछलियों के प्रजनन और संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सके।
याचिकाकर्ता ने बताया कि कन्याकुमारी जिले के अरब सागर तट पर संचालित मशीनीकृत और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले जहाजों पर भी 1 जून से 31 जुलाई तक अलग से प्रतिबंध लागू रहता है। यह प्रतिबंध केरल और पश्चिमी तट के अन्य क्षेत्रों में लागू नियमों के अनुरूप लगाया जाता है। याचिका में कहा गया कि तमिलनाडु ने वर्ष 2024-25 में 5,744 करोड़ रुपये और 2025-26 (अनंतिम आंकड़ों) में लगभग 6,323 करोड़ रुपये के समुद्री उत्पादों का निर्यात किया। इसके बावजूद मछुआरा समुदाय प्रतिबंध अवधि के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में रहता है क्योंकि सरकार की ओर से मिलने वाली आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, वर्तमान में राज्य सरकार 61 दिनों की प्रतिबंध अवधि के लिए मछुआरों को 8,000 रुपये की राहत राशि देती है। उनका कहना है कि यह राशि दो महीने तक परिवार के भोजन, बच्चों की शिक्षा और अन्य आवश्यक खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। याचिका में अन्य तटीय राज्यों द्वारा दिए जा रहे अधिक मुआवजे का भी उल्लेख किया गया है। साथ ही कहा गया है कि सत्तारूढ़ सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में भी मछुआरों को अधिक सहायता देने का वादा किया था। इसलिए अदालत से मांग की गई कि सरकार को निर्देश दिया जाए कि प्रतिबंध अवधि के दौरान प्रत्येक पंजीकृत मछुआरा परिवार को 20,000 रुपये प्रति माह की राहत राशि प्रदान की जाए।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार और एम. जोतिरामन की खंडपीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने कहा कि यह विषय सरकार की नीतिगत सीमा के अंतर्गत आता है। हालांकि, अदालत ने संबंधित अधिकारियों को जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई तक स्थगित कर दिया।