हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित ज्वाला देवी का मंदिर एक अद्भुत धार्मिक स्थल है, जहां प्राकृतिक रूप से जलती नौ ज्वालाएं देवी के नौ रूपों का प्रतीक मानी जाती हैं। ज्वाला देवी का मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल और आस्था का केंद्र है, बल्कि इसके साथ जुड़ी कई रहस्यमयी कथाएं और पौराणिक घटनाएं इस मंदिर को और भी अधिक रोमांचक बनाती हैं।
प्राचीन समय की बात है, जब राक्षसों ने हिमालय पर्वत पर अपना अधिकार जमा लिया था और देवताओं को परेशान करने लगे थे। तब भगवान विष्णु ने अन्य देवताओं के साथ मिलकर राक्षसों को नष्ट करने का निर्णय लिया। भगवान विष्णु ने अपनी शक्तियों को केंद्रित किया, जिसके कारण धरती से बड़ी ज्वालाएं उत्पन्न हुईं। उन अग्नि की लपटों से एक छोटी लड़की ने जन्म लिया, जिन्हें आदिशक्ति माना गया।
सती या पार्वती के रूप में जानी जाने वाली देवी प्रजापति दक्ष के घर पली-बढ़ीं और बाद में वे भगवान शिव की अर्धांगिनी बनीं। एक बार उनके पिता ने भगवान शिव का अपमान किया, तब अपने पति के अपमान को सहन न कर पाने के कारण देवी सती ने अग्निकुंड में प्रवेश कर लिया। जब यह बात भगवान शिव को पता चली तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे और देवी सती के शरीर को लेकर तीनों लोकों में भ्रमण करने लगे। भगवान शिव के क्रोध को देखकर समस्त देवता कांप उठे और उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता मांगी।
भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर के विभिन्न अंग कर दिए, जो भारत के अलग-अलग स्थानों पर गिरे। इन्हें शक्तिपीठ कहा जाता है। ज्वाला देवी मंदिर उस स्थान पर स्थित है जहां देवी सती की जीभ गिरी थी। यहां देवी की नौ ज्वालाएं प्रकट होती हैं, जिन्हें देवी के नौ स्वरूपों में पूजा जाता है। इनमें सबसे प्रमुख ज्वाला माता मानी जाती हैं। इन ज्वालाओं को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडीदेनी, महालक्ष्मी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, सरस्वती, अंबिका और अंजी देवी के नाम से जाना जाता है।
इतिहास में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि मुगल सम्राट अकबर ने देवी की जलती हुई ज्वालाओं को बुझाने का प्रयास किया, लेकिन सभी प्रयास विफल रहे। इस चमत्कार को देखकर अकबर ने माता को 50 किलो सोने का छत्र अर्पित किया, लेकिन वह छत्र किसी अन्य पदार्थ में बदल गया। आज भी यह छत्र मंदिर में रखा गया है।
वैज्ञानिकों ने भी इस रहस्य को सुलझाने का प्रयास किया है, लेकिन वे अब तक पूरी तरह से सफल नहीं हो सके हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह दिव्य ज्वालाएं गैसों के रिसाव के कारण जल रही हैं, पर इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है। इस रहस्य को देखकर यही प्रतीत होता है कि ये ज्वालाएं प्राकृतिक नहीं, बल्कि चमत्कारी रूप से जल रही हैं।