दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें 13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिका में नाबालिगों को ऑनलाइन हानिकारक कंटेंट और डिजिटल लत से बचाने के लिए एक व्यापक नियम बनाने की भी मांग की गई है। बुधवार को मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने इस मामले पर थोड़ी देर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति तेजस करिया ने खुद को मामले से अलग कर लिया। अब इस मामले को किसी दूसरी पीठ के सामने सूचीबद्ध किए जाने की संभावना है।
यह याचिका तीन साल के बच्चे की मां कीर्ति दुआ और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शरद गुप्ता ने दायर की है। याचिका में केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ-साथ राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) को पक्षकार बनाया गया है। इसके अलावा मेटा, अल्फाबेट (गूगल), टेलीग्राम, स्नैप इंक और एक्स कॉर्प जैसी प्रमुख सोशल मीडिया कंपनियों को भी पक्षकार बनाया गया है।
याचिका में कहा गया है कि बच्चे तेजी से अश्लील और उम्र के हिसाब से अनुचित कंटेंट, साइबर बुलिंग और सोशल मीडिया की लत लगाने वाले डिजाइन के संपर्क में आ रहे हैं। इसका बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। याचिका में यह भी कहा गया है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, आईटी नियम, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट और पॉक्सो एक्ट जैसे मौजूदा कानूनों के बावजूद इनका सही तरीके से पालन नहीं हो पा रहा है।
याचिका में केंद्र सरकार से 13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित करने के लिए बाध्यकारी कानून और दिशानिर्देश बनाने की मांग की गई है। इसके साथ ही मजबूत उम्र सत्यापन व्यवस्था और माता-पिता की सहमति को अनिवार्य करने की भी मांग की गई है। याचिका में सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए जवाबदेह बनाने और नाबालिगों को हानिकारक कंटेंट से बचाने के लिए उचित कदम उठाने की मांग भी की गई है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट के ऑनलाइन बाल सुरक्षा और बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े कई फैसलों का भी हवाला दिया गया है। इसके अलावा, दूसरे देशों में नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर बनाए गए सख्त नियमों का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बच्चों में बढ़ती डिजिटल लत और ऑनलाइन खतरों से निपटने के लिए भारत में एक व्यापक कानूनी और नियामक व्यवस्था की जरूरत है।