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पिछले 8 साल से नवजीवन विहार के घरों का कचरा नहीं गया लैंडफिल, कचरे को रिसाइकिल करके पेश की मिसाल

Delhi: देश के बड़े शहरों के लिए कचरा एक चुनौती है और दिल्ली भी इसका अपवाद नहीं है। दिल्ली में कचरे के पहाड़ हर दिन बड़े होते जा रहे हैं। हालांकि, इस चुनौती को मात देने के लिए दक्षिण दिल्ली की एक आवासीय कॉलोनी ने छोटा लेकिन अहम कदम उठाया है। पिछले आठ सालों से, नवजीवन विहार के 280 घरों से निकलने वाला कचरा लैंडफिल में नहीं गया है।

रसोई के कचरे से लेकर, प्लास्टिक रैपर, पुराना फर्नीचर, टूटे खिलौनों और इस्तेमाल किए गए कपड़ों तक को रिसाइकल किया जाता है या खाद में बदल दिया जाता है। इस पहल के पीछे 52 साल की आई सर्जन डॉ. रूबी मखीजा हैं, जो पिछले आठ सालों से कॉलोनी की आरडब्ल्यूए सचिव के रूप में काम कर रही हैं।

रसोई के कचरे से रोजाना करीब 125 किलो खाद बनाई जाती है जिसका इस्तेमाल कॉलोनी के पेड़-पौधों को पोषण देने के लिए किया जाता है। वहीं, कागज, धातु, प्लास्टिक और कांच जैसे कचरे को रिसाइकल करने वालों के पास भेजा जाता है। दूसरी तरह के कचरे, जैसे सैनिटरी आइटम और एक्सपायरी दवाइयां, सुरक्षित निपटान के लिए दिल्ली नगर निगम को सौंप दी जाती हैं।

करीब 900 किलो प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल सार्वजनिक जगहों पर बेंच बनाने के लिए भी किया गया है। हालांकि, इस सफर की शुरुआत इतनी आसान नहीं थी क्योंकि इसे विरोध का सामना करना पड़ा था।

आलम ये है कि कॉलोनी के लोग गर्व से अपने इन कोशिशों को नारा देते हुए कहते हैं 'जीरो वेस्ट टू लैंडफिल' यानी लैंडफिल तक कोई कचरा नहीं जाना। अब ये महज एक नारा नहीं है, बल्कि हर दिन वो ऐसा करने में कामयाब हो रहे हैं।

2017 में एक छोटे से विचार से शुरू हुआ ये प्रयास अब एक आदर्श बन गया है जिसे दिल्ली छावनी और शहर के दूसरे हिस्सों समेत कई कॉलोनियों में अपनाया जा रहा है। हालांकि, गीले कचरे को खाद में बदलने में करीब दो महीने लगते हैं, लेकिन सही मायने में बदलाव लोगों की मानसिकता में आया है।