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सुप्रीम कोर्ट का उमर और शरजील को जमानत देने से इनकार, जनवरी के अपने ही फैसले पर उठाया सवाल

New Delhi: उच्चतम न्यायालय ने नार्को-आतंकवाद के एक मामले में मुकदमे का सामना कर रहे व्यक्ति को सोमवार को यह कहकर जमानत दे दी कि जमानत नियम है और जेल अपवाद, यहां तक कि यूएपीए मामले में भी यही नियम लागू होता है। व्यक्ति पर जम्मू कश्मीर में मादक पदार्थों की तस्करी और आतंकवाद के वित्तपोषण में संलिप्तता के आरोप हैं।

न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने हंदवाड़ा निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को राहत प्रदान करते हुए उसे अपना पासपोर्ट जमा करने और हर 15 दिन में एक बार स्थानीय थाने में रिपोर्ट करने का निर्देश दिया।

राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की संबंधित धाराओं के तहत 2020 में दर्ज मामले की जांच कर रहा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यूएपीए की धारा 43डी(5) अनिश्चितकालीन कारावास को उचित नहीं ठहरा सकती और इसे अनुच्छेद 21 और 22 के अधीन ही लागू होना चाहिए। यह धारा जमानत संबंधी सख्त प्रतिबंध निर्धारित करती है।

दिल्ली दंगों से संबंधित गुलफिशा फातिमा मामले में दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए फैसले को अस्वीकार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि इसमें के. ए. नजीब मामले में दिए गए फैसले का ठीक से पालन नहीं किया गया है जिसमें यूएपीए के तहत मामलों में लंबे समय तक मुकदमे में देरी को जमानत का आधार माना गया था।

दिल्ली दंगा मामले में शीर्ष अदालत ने कई आरोपियों को जमानत दे दी थी लेकिन छात्र नेता उमर खालिद और शरजील इमाम को यह राहत नहीं मिली थी। पीठ ने कहा, ‘‘जमानत नियम है और जेल अपवाद है। यह अनुच्छेद 21 और 22 से निकला एक संवैधानिक सिद्धांत है और निर्दोष होने की धारणा कानून के शासन द्वारा शासित किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला है।’’

पीठ ने कहा, ‘‘हमें यह कहने में कोई संदेह नहीं है कि यूएपीए के तहत भी जमानत नियम है और जेल अपवाद। बेशक, उचित मामले में उस विशेष मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जमानत से इनकार किया जा सकता है।’’

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि के.ए. नजीब मामले में उसका फैसला बाध्यकारी कानून है और अधीनस्थ अदालतों, उच्च न्यायालयों या यहां तक कि उच्चतम न्यायालय की अधीनस्थ पीठों द्वारा भी इसे कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

के. ए. नजीब मामला यूएपीए के तहत जमानत के संबंध में 2021 में दिया गया उच्चतम न्यायालय का एक ऐतिहासिक फैसला है। अंद्राबी ने जम्मू कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने कहा था कि मोबाइल फोन रिकॉर्ड की जांच से पता चलता है कि अंद्राबी सीमा पार आतंकी संगठनों के संपर्क में था। एनआईए ने मामले में जांच से लेकर आरोपियों की गिरफ्तारी तक के घटनाक्रम को बताया।

उसने कहा कि 11 जून 2020 को पुलिस ने हंदवाड़ा के कैरो ब्रिज पर अब्दुल मोमिन पीर की कार को रोका था। तलाशी के दौरान 20.01 लाख रुपये नकद और दो किलोग्राम हेरोइन जब्त की गई और पीर को गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में उसके खुलासे पर अंद्राबी और इस्लाम-उल-हक पीर को गिरफ्तार किया गया।

आरोपपत्र के अनुसार, जांच में पता चला कि आरोपी कथित तौर पर पाकिस्तान में स्थित अपने सहयोगियों से हेरोइन प्राप्त करने के बाद जम्मू कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में सीमा पार तस्करी और आपूर्ति में शामिल था।

आरोपपत्र में कहा गया है कि अंद्राबी और अब्दुल मोमिन पीर ने 2016-17 के दौरान कई बार पाकिस्तान का दौरा किया था ताकि वे आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन (एचएम) के सदस्यों से मिल सकें। इसमें यह भी कहा गया है कि हेरोइन की बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग आरोपियों ने लश्कर-ए-तैयबा की आतंकवादी गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए किया था।