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'धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला', जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने की वंदे मातरम् पर सरकार के आदेश की आलोचना

New Delhi: प्रमुख मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने गुरुवार को केंद्र के उस आदेश को ‘‘एकतरफा और मनमाना’’ बताया जिसमें सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों को गाना अनिवार्य कर दिया गया है। जमीयत ने आरोप लगाया कि यह संविधान से मिली धार्मिक स्वतंत्रता पर ‘‘खुला हमला’’ है।

जमीयत के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि मुसलमान किसी को भी वंदे मातरम् गाने से नहीं रोकते, लेकिन गाने की कुछ पक्तियां ऐसी मान्यताओं पर आधारित हैं जो मातृभूमि को एक देवी के रूप में दिखाती हैं, जो एकेश्वरवादी धर्मों की मूल भावनाओं के खिलाफ हैं।

मदनी ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और आयोजनों में इसकी समस्त पंक्तियों को अनिवार्य करना केंद्र सरकार का न केवल एक पक्षपाती और जबरदस्ती थोपा गया फैसला है, बल्कि यह संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर खुला हमला और अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनने का निंदनीय प्रयास है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मुसलमान किसी को वंदे मातरम् पढ़ने या उसकी धुन बजाने से नहीं रोकते, मगर उसकी कुछ पंक्तियां बहुदेववादी आस्था पर आधारित हैं और मातृभूमि को ईश्वर के रूप में प्रस्तुत करती हैं जो एकेश्वरवादी धर्म की आस्था से टकराती हैं, इसलिए मुसलमान, जो केवल एक अल्लाह की वंदना करता है, उसे इसे पढ़ने पर विवश करना संविधान की धारा 25 और उच्चतम न्यायालय के फैसलों का खुला उल्लंघन है।’’

जमीयत प्रमुख ने दावा किया कि इस गीत को अनिवार्य कर देना और नागरिकों पर थोपने का प्रयास वास्तव में देशप्रेम नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति, सांप्रदायिक एजेंडे और जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने की सोची-समझी चाल है।

उन्होंने कहा, ‘‘मातृभूमि से प्रेम का आधार नारे नहीं, बल्कि चरित्र और बलिदान हैं, जिनका उज्ज्वल उदाहरण मुसलमानों और जमीयत उलमा-ए-हिंद का अभूतपूर्व संघर्ष है। इस प्रकार के फैसले देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने के साथ-साथ संविधान का भी उल्लंघन हैं।’’