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देहरादून में 1955 से घड़ियों को दे रहे नई ज़िंदगी, 150 साल पुराना दुर्लभ संग्रह

Uttarakhand: देहरादून में एक छोटी-सी कार्यशाला है, जहाँ समय केवल चलता नहीं, बल्कि सहेजा जाता है। 86 वर्षीय पृथ्वीराज भोला पिछले सात दशकों से घड़ियों की दुनिया में अपनी बेमिसाल कारीगरी से जान फूंक रहे हैं। उन्होंने महज़ 15 वर्ष की उम्र में, वर्ष 1955 में घड़ियों को बनाने और सुधारने का काम शुरू किया था, जो आज उनकी तीसरी पीढ़ी तक पहुँच चुका है।

पृथ्वीराज भोला के पास लगभग 100 से 150 साल पुरानी दुर्लभ घड़ियों का अनूठा संग्रह मौजूद है। इस संग्रह में देशी ही नहीं, बल्कि विदेशी विंटेज घड़ियाँ भी शामिल हैं, जिनके पुर्ज़े आज के समय में मिलना लगभग नामुमकिन माना जाता है। इसके बावजूद, पृथ्वीराज अपनी कुशलता से इन घड़ियों को फिर से चलने लायक बना देते हैं।

पृथ्वीराज भोला बताते हैं कि घड़ीसाज़ी का यह हुनर उन्हें विरासत में मिला है। उनके पिता और दादा भी पेशे से वॉचमेकर थे। उन्होंने कहा, मैंने 15 साल की उम्र से काम करना शुरू किया। टेक्नोलॉजी मेरे अंदर नैचुरल आई है। कभी-कभी घड़ियों के पुर्ज़े बनाने के लिए अपने खुद के औज़ार और उपकरण भी तैयार करता हूँ। इतने सालों का अनुभव ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।”

खास बात यह है कि देहरादून में पृथ्वीराज भोला ऐसे इकलौते कारीगर हैं, जो पुरानी विदेशी घड़ियों के लिए ज़रूरत पड़ने पर उनके पुर्ज़े खुद बनाते हैं और उनकी मरम्मत भी करते हैं। उनके पास ऐसी दुर्लभ घड़ियाँ भी आती हैं, जिन्हें अन्य जगहों पर ठीक करने से मना कर दिया जाता है। पृथ्वीराज का दावा है कि उन्होंने 200 से 300 साल पुरानी विंटेज घड़ियों को भी सफलतापूर्वक रिपेयर किया है।

वे बताते हैं कि पहले के दौर में मैकेनिकल घड़ियों पर काफी मेहनत करनी पड़ती थी, जबकि आज क्वार्ट्ज घड़ियों में काम अपेक्षाकृत आसान हो गया है। हालांकि, उनके पास अब भी उनके पिता और दादा के समय का पुराना स्टॉक और मटेरियल सुरक्षित है, जिसकी मदद से वे पुराने और बंद हो चुके मॉडलों के पुर्ज़े तैयार कर लेते हैं।

पृथ्वीराज का काम केवल मरम्मत तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग इस पारंपरिक कला को सीखने उनके पास आते हैं। वे खुद ही पुर्ज़ों को असेंबल करने में निपुण हैं और इस विरासत को आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं।

डिजिटल और स्मार्ट घड़ियों के इस आधुनिक दौर में पृथ्वीराज भोला जैसे कारीगर न सिर्फ समय को मापने का काम कर रहे हैं, बल्कि एक लुप्त होती पारंपरिक कला और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखे हुए हैं।