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आपातकाल के 50 साल: जेल हुआ करता था बेंगलुरू का फ्रीडम पार्क, दिग्गज नेताओं ने यहीं से बुलंद किया विरोध का सुर

दुनिया कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू के फ्रीडम पार्क को विरोध प्रदर्शनों के लिए तय जगह के रूप में जानती है। ये एक ऐसी जगह है, जिसपर हर राजनैतिक दल, हर सामाजिक कार्यकर्ता और हर नागरिक का समान अधिकार है। कम ही लोग जानते हैं कि ये वही जगह है जहां कभी बेंगलुरू सेंट्रल जेल हुआ करती थी। ब्रिटिश काल में बनाई गई तगड़ी सुरक्षा वाली जेल।

उस जेल में देश के कुछ मशहूर राजनैतिक हस्तियों और कार्यकर्ताओं को कैद किया गया था। न सिर्फ आजादी की लड़ाई के दौरान, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के एक और अध्याय - आपातकाल के समय भी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून, 1975 को आपातकाल लगाया था। इस घटना को 50 साल हो चुके हैं। बेंगलुरु का फ्रीडम पार्क लोकतंत्र के लिए अजनबी दौर का चश्मदीद है।

बेंगलुरु सेंट्रल जेल में पार्टी लाइन से परे कई नेताओं को बंद किया गया था। उनमें लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, रामकृष्ण हेगड़े, एच. डी. देवेगौड़ा और न्यायमूर्ति एम. रामा जोइस के अलावा स्नेहलता रेड्डी और माइकल फर्नांडिस जैसे मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता भी थे।

जो कभी कैदखाना था, वो अब प्रतिरोध और यादों का प्रतीक है। आर. अशोक कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। वे 1970 के दशक में छात्र थे। उन्होंने उस दौर को भारतीय इतिहास का सबसे काला दिन बताया। उन्होंने याद किया कि किस तरह एक विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था और एक महीना जेल में बंद रखा गया था।

बीजेपी प्रवक्ता एस. प्रकाश भी 1970 के दशक में छात्र थे। उन दिनों को याद करते हुए वे बताते हैं कि वो ऐसा दौर था, जो तनाव, अनिश्चितता और भय से भरा हुआ था। बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में पुरानी जेल का एक हिस्सा अब भी खड़ा है। इसकी एकांत कोठरी और ढहती दीवारें उस दौर की मूक गवाह हैं जब लोकतंत्र को एक अजनबी दौर देखने को मिला था। फ्रीडम पार्क राजनैतिक दिग्गजों से लेकर छात्र प्रदर्शनकारियों तक का चश्मदीद रहा है। आजादी के पहले भी और आजादी के बाद भी। यहां आज भी अपना हक पाने की आवाजें गूंजती हैं - शायद पहले से कहीं ज्यादा तेज।