उत्तराखंड के चंपावत जिले का टनकपुर इलाका आज एक चीख से दहल उठा। नई बस्ती की रहने वाली माधुरी देवी रोज की तरह अन्य महिलाओं के साथ जंगल में लकड़ी लेने गई थीं, लेकिन उन्हें क्या पता था कि मौत झाड़ियों के पीछे घात लगाए बैठी है। सेनापानी मार्ग पर अचानक एक विशालकाय हाथी ने उन पर हमला कर दिया। माधुरी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। अस्पताल पहुंचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया। इस दर्दनाक मौत ने पूरे इलाके में वन विभाग के खिलाफ आक्रोश भर दिया है।
त्रासदी सिर्फ चंपावत तक सीमित नहीं है। धर्मनगरी हरिद्वार के जगजीतपुर में भी गजराज का 'फुल साइज' ड्रामा देखने को मिला। गुरुवार की आधी रात जब लोग गहरी नींद में थे, एक जंगली हाथी संकरी गलियों में दाखिल हो गया। हाथी ने एक घर के बाहर खड़ी स्कूटी को ऐसे उठाकर पटका जैसे वो कोई खिलौना हो। लोग अपनी छतों से जान बचाकर यह मंजर देखते रहे। यहां हर रात दहशत की होती है, और दिन डर के साये में बीतता है।
अब रुख करते हैं पौड़ी जिले के कालागढ़ टाइगर रिजर्व का। यहां के झुडगू गांव में हाथी ने 5 मीटर लंबी दीवार गिरा दी और लहलहाती फसलों को तहस-नहस कर दिया। लेकिन यहां की कहानी और भी कड़वी है। ग्रामीणों का आरोप है कि मुख्यमंत्री के सख्त निर्देशों के बावजूद वन विभाग के बड़े अधिकारी फोन तक उठाना मुनासिब नहीं समझते। आपदा के समय जब जनता को तंत्र की जरूरत होती है, तब साहब के फोन 'नॉट रीचेबल' मिलते हैं।
जंगलों का सिकुड़ना, भोजन की कमी और मानवीय दखल ने गजराज को बस्तियों की ओर मोड़ दिया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन केवल मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेगा? कब तक ग्रामीण अपनी जान और माल की कुर्बानी देते रहेंगे? टनकपुर की माधुरी की मौत और हरिद्वार की वो टूटी स्कूटी, चीख-चीख कर एक ही सवाल पूछ रही है—गजराज के इस गुस्से का स्थायी समाधान कब निकलेगा?