Tuesday, September 27, 2022

'मुफ्त योजनाओं' के बचाव में सुप्रीम कोर्ट पहुंची AAP, जानें क्या है पूरा मामला



आम आदमी पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान मुफ्त की योजनाओं का वादा करने वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ एक जनहित याचिका का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की है. 

पार्टी ने अपनी अर्जी में कहा है कि मुफ्त पानी, मुफ्त बिजली, मुफ्त परिवहन जैसे चुनावी वादे मुफ्त नहीं हैं, क्योंकि ये योजनाएं आर्थिक असमानता वाले समाज में बेहद जरूरी हैं. साथ ही  इस मामले में पार्टी ने  खुद को पक्षकार बनाए जाने की भी मांग की है और इस तरह की घोषणाओं को राजनीतिक पार्टियों का लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार बताया है. 
वहीं उन्होंने  याचिकाकर्ता को भाजपा का सदस्य बताते हुए उनकी मंशा पर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि यह जनहित याचिका नहीं, राजनीतिक हित याचिका है. आपको बता दें कि आम आदमी पार्टी जिस किसी राज्य में भी चुनाव लड़ने जा रही है, वहां मुफ्त बिजली देने की घोषणा करती है.

आखिर क्या है य़ाचिका में-
दरअसल वकील अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि चुनाव प्रचार के दौरान मुफ्त की योजनाओं की घोषणा को मतदाताओं को रिश्वत देने की तरह देखा जाए. चुनाव आयोग अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ऐसी घोषणाएं करने वाली पार्टी की मान्यता रद्द करे. उन्होंने ये भी कहा कि याचिका में दावा किया गया है कि चुनाव से पहले सार्वजनिक धन से तर्कहीन मुफ्त का वादा या वितरण एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ों को हिलाता है और चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता को खराब करता है. दलों पर शर्त लगाई जानी चाहिए कि वे सार्वजनिक कोष से चीजें मुफ्त देने का वादा या वितरण नहीं करेंगे.

कोर्ट ने केंद्र सरकार, नीति आयोग, वित्त आयोग और आरबीआई से मांगा सुझाव
शीर्ष अदालत ने 3 अगस्त को केंद्र सरकार, नीति आयोग, वित्त आयोग और आरबीआई जैसे हितधारकों से चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त की योजनाओं का वादा करने के मुद्दे पर विचार करने और इससे निपटने के लिए रचनात्मक सुझाव देने के लिए कहा था. अदालत ने इस मुद्दे से निपटने के लिए सरकार को उपाय सुझाने के लिए एक तंत्र स्थापित करने का आदेश देने का संकेत दिया था.

मुफ्त योजनाओं से अर्थव्यवस्था को नुकसान
पिछले हफ्ते चीफ जस्टिस एन.वी. रमण की अध्यक्षता वाली बेंच ने गैरजरूरी मुफ्त योजनाओं से अर्थव्यवस्था को हो रहे नुकसान पर चिंता जताई थी. राज्यों पर बकाया लाखों करोड़ों रुपये के कर्ज का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले के समाधान के लिए एक कमेटी बनाने के संकेत दिए थे.

निर्वाचन आयोग ने भी दिया राय
इस याचिका पर अप्रैल में हुई सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि चुनाव से पहले या बाद में मुफ्त उपहार देना राजनीतिक दलों का नीतिगत फैसला है. वह राज्य की नीतियों और पार्टियों की ओर से लिए गए फैसलों को नियंत्रित नहीं कर सकता. आयोग ने कहा कि इस तरह की नीतियों का क्या नकारात्मक असर होता है, ये आर्थिक रूप से व्यवहारिक हैं या नहीं, ये फैसला करना वोटरों का काम है. आपको बता दें कि चुनाव आयोग ने यह हलफनामा वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की जनहित याचिका के जवाब में दाखिल किया था.

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