Breaking News

केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद तेल रिफाइनरियों ने एलपीजी उत्पादन में 10 प्रतिशत की वृद्धि की     |   2026 तक 10.73 करोड़ बैरल प्रतिदिन हो जाएगी तेल की खपत. सऊदी अरामको CEO का दावा     |   लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: BJP ने 11 मार्च के लिए सांसदों को जारी किया व्हिप     |   तेल सप्लाई संकट के बीच मिस्र में ईंधन महंगा, कीमतें 30% तक बढ़ीं     |   क्षेत्रीय तेल निर्यात रोकेगा ईरान, IRGC ने अमेरिकी-इजरायली हमलों के बीच दी धमकी     |  

'यूसीसी लागू करने का समय आ गया', शरिया कानून के प्रावधानों को रद्द करने की याचिका पर बोला सुप्रीम कोर्ट

New Delhi: उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि अब ‘समान नागरिक संहिता’ (यूसीसी) लागू करने का समय आ गया है। शीर्ष अदालत ने 1937 के शरिया कानून के प्रावधानों को मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण बताते हुए निरस्त करने के अनुरोध वाली याचिका को एक बहुत अच्छा मामला बताया और कहा कि इस पर केवल विधायिका (सरकार) को ही विचार करना चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि अगर न्यायालय शरिया उत्तराधिकार कानून को निरस्त करता है, तो इससे कानून में शून्य की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी, क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को निर्देशित करने वाला कोई वैधानिक कानून नहीं है।

प्रधान न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण से कहा, ‘‘सुधारों के प्रति हमारे अति-उत्साह में, हम उन्हें वंचित कर सकते हैं, और उन्हें पहले से मिल रहे अधिकारों से कम मिल सकता है। यदि 1937 का शरिया कानून खत्म हो जाता है, तो फिर क्या कहना? क्या इससे एक अनावश्यक शून्य उत्पन्न नहीं होगा?’’

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘भेदभाव के मुद्दे पर आपका मामला बहुत मजबूत है, लेकिन क्या यह उचित नहीं होगा कि न्यायालय इस मामले को विधायिका के विवेक पर छोड़ दे, जिसे राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों (डीपीएसपी) के अनुसार, समान नागरिक संहिता लागू करने का अधिकार प्राप्त है?’’

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘‘इसका उत्तर है समान नागरिक संहिता।’’ न्यायमूर्ति बागची ने इस बात पर जोर दिया कि 'एक पुरुष की एक पत्नी' का नियम सभी समुदायों पर समान रूप से लागू नहीं हो रहा है।

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि अदालत सभी बहुविवाहों को असंवैधानिक घोषित कर सकती है? इसलिए, हमें निदेशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए विधायी शक्ति का सहारा लेना होगा।’’ उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को विधायिका के विवेक पर छोड़ना ही सबसे अच्छा होगा।

सुनवाई की शुरूआत में भूषण ने ये दलील दी कि न्यायालय ये घोषणा कर सकता है कि मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के समान उत्तराधिकार प्राप्त हैं और यदि न्यायालय 1937 के ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लीकेशन एक्ट’ को रद्द कर देता है तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधान लागू होंगे।