UP News: शिक्षा, कितनी जरूरी है यह बात तो हम सभी जानते है, मगर शिक्षा क्यों जरूरी है यह सिर्फ रामकेवल जैसे मेहनतकश युवा ही जानते है, एक ऐसा युवा जिसने शादी बारात में रात रात भर लाइट्स सिर पर ढोई और अगली सुबह अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए स्कूल पहुंचा, रामकेवल शादियों में शामिल तो हुए मगर एक मजदूर की तरह, लेकिन अपनी मां के प्रण को पूरा करने के लिए जी जान से पढ़ाई की और हाइस्कूल पास किया, आप भी सोच रहे होंगे कि लाखो छात्रों ने हाइस्कूल परीक्षा पास की, तो रामकेवल ने ऐसा क्या कमाल कर दिया तो आगे की कहानी आपको हैरान कर देगी, क्योंकि रामकेवल ने आजादी के बाद अपने गांव से हाइस्कूल पास करने वाले पहले छात्र बने है।
एक छात्र जिसने हाइस्कूल पास किया, जब मीडिया उसके घर पहुंचा तो उसकी आंखों में आंसू थे, माता ने पल्लू से उसके आंसू पोछे, मां और बेटे दोनों समझ नहीं पा रहे थे कि ये आंसू खुशी के है या उस व्यवस्था के जिसके ये शिकार हुए, चलिए अब आपको यह पूरा मामला समझाते है, "कहते हैं हौसले हो बुलंद कुछ कर गुजरने की हो चाह तो कामयाबी कदम चूमने को होती है मजबूर ऐसा ही बाराबंकी जिले के निजामपुर मजरे अहमदपुर गांव के निवासी राम केवल ने यह साबित कर दिखाया, दरअसल इस गांव में आजादी के 77 साल बाद तक कोई व्यक्ति हाई स्कूल पास नहीं कर पाया 2025 में राम केवल में इस रिकार्ड को तोड़ते हुए हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद डीएम शशांक त्रिपाठी ने युवक को सम्मानित करते हुए कहा राम केवल ने न सिर्फ परीक्षा पास की है बल्कि गांव में शिक्षा की भावनाओं को बल दिया है।
शिक्षा शेरनी का वह दूध है जो इसे पिएगा दहाड़ेगा, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की यह लाइन चरितार्थ होती है। यूपी की राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी जिले के एक युवक राम केवल मैं ₹300 प्रतिदिन की मजदूरी करते हुए शिक्षा को महत्व दिया और मजदूरी के साथ-साथ समय निकालकर पढ़ाई भी की। जिसका नतीजा यह हुआ की आजादी के बाद गांव में पहली बार कोई युवक हाई स्कूल की परीक्षा पास कर सकें जिसको लेकर गांव में खुशी का माहौल है।
प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक शैलेंद्र द्विवेदी ने बताया कि अंग्रेजी शासन काल से निजामपुर में या विद्यालय है। सन 1923 में स्थापना व 1926 से विद्यालय संचालित हुआ था यहां कांग्रेस के नेता मोहसिन की दवाई ने भी परीक्षा पास की थी, जिसका शिलान्यास 2013 में किया गया था। गांव के चारों तरफ स्कूल होने के बावजूद निजामपुर के लोगों में पढ़ने की ललक नहीं थी। यहां अधिकांश लोग मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं। राम केवल के पिता जगदीश प्रसाद निरक्षर होने के बावजूद अपने बेटे को पढ़ाने की ठान ली। राम केवल की मां प्राथमिक विद्यालय में रसोईया है जो अपने बेटे को कक्षा 8 पर पास करने के बाद जीआईसी अहमदपुर में दाखिला कराया किसी तरह से रुपए इकट्ठा कर फीस जमा की पुष्पा ने हार नहीं मानी और स्कूल रसोइया का कार्य करने पर मिलने वाले मंडे से उन्होंने अपने बेटे की फीस के पैसे दिए पुष्पा ने बताया कि बचपन में अपने भाई को डिबरी की रोशनी में पढ़ते देखती थी।
वहीं छात्र राम केवल ने रोते हुए बताया कि वह जब स्कूल जाता था तो बच्चे यह कहकर चिढ़ाते थे कि तुम्हारे गांव में कोई आज तक हाई स्कूल पास नहीं है तुम भी पास नहीं हो पाओगे। जिसके बाद उसने मन में ठान ली थी हाई स्कूल पास कर अपना व अपने गांव का मान बढ़ाना है। इसके बाद उसने रोड लाइट में रात की मजदूरी करते हुए भी पढ़ाई पर ध्यान दिया और उसे इतिहास को भी बदल दिया अब कोई भी या नहीं कह सकेगा कि इस गांव में हाई स्कूल पास कोई व्यक्ति नहीं है।